गुरूवार, 29 अक्टूबर 2026

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कन्हान पुल की जमीन के मुआवजे पर हाई कोर्ट को याचिका में प्रथम दृष्टया दम नहीं दिखा

कन्हान पुल की जमीन के मुआवजे पर हाई कोर्ट को याचिका में प्रथम दृष्टया दम नहीं दिखा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
शहर PT24 टीम

नागपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर कन्हान नदी के पुल के लिए ली गई जमीन के मुआवजे की याचिका पर हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया मेरिट न होने के संकेत दिए। याचिकाकर्ता का वकील बदलने का निवेदन मंजूर कर सुनवाई स्थगित हुई।

नागपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर कन्हान नदी के मुख्य पुल के लिए जमीन ली गई थी। इसके मुआवजे को लेकर हाई कोर्ट में दायर याचिका पर अदालत ने साफ संकेत दिया है कि पहली नजर में इसमें मेरिट नहीं दिखती। याचिका कृष्णा अग्रवाल की ओर से लगाई गई थी और इसमें मुआवजे की दर बढ़ाने की मांग की गई थी।

सुनवाई न्यायाधीश अनिल पानसरे और न्यायाधीश निवेदिता मेहता के सामने हुई। दोनों न्यायाधीशों ने कहा कि याचिकाकर्ता को कानून के मुताबिक उचित मुआवजा पहले ही दिया जा चुका है।

सुनवाई के दौरान कृष्णा अग्रवाल खुद अदालत में मौजूद थे। उन्होंने कहा कि वे अपना वकील बदलना चाहते हैं। अदालत ने उनकी यह बात मान ली और वकील को मामले से कार्यमुक्त कर दिया। साथ ही अगली तारीख से पहले दूसरी कानूनी व्यवस्था करने की अनुमति देकर सुनवाई स्थगित कर दी गई।

अदालत के निर्देश पर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने एक अतिरिक्त हलफनामा दाखिल किया। उसमें दिए गए मुआवजे का पूरा ब्योरा रखा गया। रिकॉर्ड देखने के बाद कोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 और 12 मई 2015 के सरकारी संकल्प के प्रावधानों के हिसाब से याचिकाकर्ता को उपयुक्त मुआवजा मिला है।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता को मिली कुल रकम रेलवे और विश्वविद्यालय को मिले मुआवजे से ज्यादा है। हलफनामे में बताया गया कि रेलवे और विश्वविद्यालय की जमीन का अधिग्रहण हुआ ही नहीं था। उसे 35 साल की अवधि के लिए लीज पर लिया गया था और एक सहमति पत्र (MoU) के तहत स्थानांतरित किया गया था। इसी वजह से हाई कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता रेलवे या विश्वविद्यालय के बराबर मुआवजे का दावा नहीं कर सकते।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि प्रतिवादियों ने 1 जून 2025 को रेलवे और नागपुर विश्वविद्यालय की जमीन का मूल्यांकन 3,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से किया था। उनका कहना था कि जब उनकी अपनी जमीन की बारी आई तो समिति ने स्लैब के हिसाब से दरें लगा दीं। इसमें 500 वर्ग मीटर तक के भूखंड के लिए 100 प्रतिशत बाजार दर रखी गई, जबकि 501 से 2000 वर्ग मीटर तक के क्षेत्रफल के लिए 10 प्रतिशत बाजार दर तय की गई।

इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने मुरलीधर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने 3,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा देने की मांग की और आरोप लगाया कि उनके साथ असमान व्यवहार हुआ है। अब मामले की अगली सुनवाई पर देखना होगा कि नई कानूनी व्यवस्था के साथ वे अदालत में क्या रखते हैं।

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