गुरूवार, 29 अक्टूबर 2026

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हर साल 29 अक्टूबर को क्यों मनाते हैं केयर एंड सपोर्ट डे, जानिए इसकी अहमियत

हर साल 29 अक्टूबर को क्यों मनाते हैं केयर एंड सपोर्ट डे, जानिए इसकी अहमियत तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
समाज PT24 टीम

संयुक्त राष्ट्र का शुरू किया यह दिन देखभाल करने वालों के योगदान को सम्मान देता है और उनके हक़ की बात उठाता है।

हमारी रोज़ की ज़िंदगी में कई लोग चुपचाप, बिना किसी शोर-शराबे के परिवार और समाज की नींव को मज़बूत रखते हैं। माता-पिता, नर्स, टीचर, घर में मदद करने वाले लोग, सामाजिक कार्यकर्ता और देखभाल करने वाले (Caregivers) इंसान की ज़िंदगी को लगातार सहारा देते रहते हैं। इन्हीं अनदेखे नायकों के बेमिसाल योगदान को सम्मान देने के लिए हर साल 29 अक्टूबर को पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय केयर एंड सपोर्ट डे (International Day of Care and Support) मनाया जाता है।

इस दिन का मुख्य मकसद यह संदेश पहुंचाना है कि किसी की देखभाल करना सिर्फ एक आदमी या एक परिवार की ज़िम्मेदारी नहीं है। यह पूरे समाज की तरक्की और अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा है।

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में देखभाल के इस काम को अक्सर गिना ही नहीं जाता, या उसे किनारे कर दिया जाता है। घर के कामों में, बुज़ुर्गों और बच्चों को संभालने में महिलाओं का योगदान बहुत बड़ा होता है, लेकिन आर्थिक हिसाब-किताब में उसे जगह नहीं मिलती। इसी पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र (UN) ने यह दिन दुनिया भर में शुरू किया, ताकि हर किसी को, चाहे वह छोटा बच्चा हो, बुज़ुर्ग हो या दिव्यांग व्यक्ति, इज़्ज़त के साथ देखभाल और सहारा मिल सके।

इस दिन का एक अहम पहलू महिलाओं के बिना मेहनताने वाले (Unpaid Care Work) और कम मेहनताने वाले देखभाल के काम को आधिकारिक पहचान दिलाना है। दुनिया भर के आंकड़ों के मुताबिक घर की देखभाल के काम में महिलाओं का हिस्सा पुरुषों से कई गुना ज़्यादा है। छोटे बच्चों को पालना, बीमार और बुज़ुर्ग रिश्तेदारों की देखभाल करना, खाना बनाना और घर का काम संभालना, इन सब की वजह से कई महिलाओं को अपनी पढ़ाई और करियर पर लगाम लगानी पड़ती है।

जब कोई महिला परिवार के लोगों की देखभाल करती है, तो वह परोक्ष रूप से देश की अर्थव्यवस्था में भी हाथ बंटाती है। उसके सहारे की वजह से ही परिवार के बाकी लोग बाहर निकलकर कमाई और उत्पादकता बढ़ा पाते हैं। संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ज़ोर दे रही हैं कि इस केयर इकॉनमी (Care Economy) की सही कीमत आंकी जाए और यह बोझ सिर्फ महिलाओं पर न रहे, बल्कि परिवार के पुरुषों और समाज के बीच बराबरी से बंटे।

देखभाल करने वाले समाज में दो तरह के होते हैं। एक औपचारिक क्षेत्र वाले (Paid Care Workers), जैसे अस्पताल की नर्सें, केयरटेकर, स्पेशल एजुकेटर और घरेलू कामगार। दूसरे अनौपचारिक (Unpaid Caregivers), जैसे माता-पिता, बच्चे या रिश्तेदार। इन दोनों को समाज में सही इज़्ज़त, सुरक्षा की गारंटी और आर्थिक सहारा मिलना ज़रूरी है।

औपचारिक क्षेत्र के केयर वर्कर्स को अक्सर कम तनख्वाह, ज़्यादा काम और सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। वहीं परिवार के स्तर पर सेवा करने वाले लोग मानसिक तनाव और थकान (Caregiver Burnout) से जूझते हैं। 29 अक्टूबर का दिन सरकार और नीति बनाने वालों को याद दिलाता है कि इन देखभाल करने वालों के हक़ की हिफ़ाज़त के लिए, उन्हें सही मानदेय देने के लिए और इलाज की सुविधाएं मुहैया कराने के लिए ठोस कानून और बुनियादी ढांचा बनाया जाना चाहिए।

यह दिन सिखाता है कि जब समाज के हर तबके को, खासकर बच्चों, बुज़ुर्गों और दिव्यांग लोगों को, पूरी देखभाल और हमदर्दी मिलती है, तभी सही मायने में सबको साथ लेकर चलने वाला (Inclusive) और दयालु समाज बनता है। इस मौके पर दुनिया भर में जागरूकता अभियान, वेबिनार, वर्कशॉप और नीतियों पर चर्चाएं होती हैं।

अपने आसपास देखभाल करने वालों का शुक्रिया अदा करना, उनके काम की तारीफ करना और उन्हें मानसिक और सामाजिक सहारा देना हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है। देखभाल और सहारे को एहसान न समझकर हर इंसान का बुनियादी हक़ और समाज का मुख्य स्तंभ मानना ही इस दिन की सच्ची सार्थकता होगी।

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