एमपीएससी अध्यक्ष भीमनवार चौकशी तक छुट्टी पर गए, 11 दिन बाद थमा छात्रों का आंदोलन
पुणे में एमपीएससी अध्यक्ष के इस्तीफे की मांग पर 11 दिन चला छात्रों का आंदोलन रविवार रात स्थगित हुआ, जब विवेक भीमनवार ने चौकशी पूरी होने तक छुट्टी पर जाने का ऐलान किया।
पुणे में महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग (एमपीएससी) के अध्यक्ष विवेक भीमनवार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहा छात्रों का आंदोलन रविवार को ग्यारह दिन बाद स्थगित हो गया। आंदोलन के आखिरी दो से ढाई घंटे काफी तनाव भरे रहे। आखिर में भीमनवार ने खुद घोषणा की कि वे जांच पूरी होने तक छुट्टी पर जा रहे हैं।
रविवार को एस. एम. जोशी पुल पर आंदोलन स्थल पर माहौल ऐसा बन रहा था कि अब सब खत्म हो जाएगा। सरकार ने कई मांगों पर सकारात्मक फैसला ले लिया था और जांच समिति का ऐलान भी हो चुका था। लेकिन जैसे ही भीमनवार के इस्तीफे का मुद्दा सामने आया, मंच पर अचानक तनाव बढ़ गया।
आंदोलन की शुरुआत धीमी रही थी। तीन दिन बाद उसने जोर पकड़ा। विवेकानंद पाटील नाम के छात्र ने नेतृत्व में सक्रिय भूमिका निभाई और उनके तीखे भाषणों से छात्रों में जोश आया। आयोग के कामकाज पर सवाल उठाते हुए अध्यक्ष के इस्तीफे की मांग और तेज हो गई।
धीरे-धीरे राजनीतिक नेता और अलग-अलग क्षेत्रों के जाने-माने लोग आंदोलन स्थल पर पहुंचे और आंदोलन को राज्य भर में अहमियत मिली। सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। दूसरी तरफ आरोप लगाया गया कि आंदोलन को दबाने की कोशिश भी हो रही है। आंदोलन के दौरान पुलिस ने लगातार दो मामले दर्ज किए, जिससे छात्रों में काफी गुस्सा था। यह बात भी चर्चा में आई कि आंदोलन का नेतृत्व कर रहे विधायक रोहित पवार का नाम मामलों से हटा दिया गया था। इसके बाद पवार खुद पुलिस थाने गए और कहा कि छात्रों का नुकसान मत कीजिए, मामला दर्ज करना है तो मुझ पर कीजिए। उन्होंने सरकार को भी मांगों को लेकर आखिरी चेतावनी दी।
सरकार की तरफ से यह बात रखी जा रही थी कि आयोग के अध्यक्ष का इस्तीफा लेने का अधिकार वह सीधे इस्तेमाल नहीं कर सकती। अध्यक्ष की नियुक्ति से जुड़ी वैधानिक प्रक्रिया का मुद्दा आगे किया गया। फिर भी छात्रों की इस्तीफे की मांग कायम रही। आंदोलन बिगड़ने के आसार दिखे तो सरकार ने मंत्री शिवेंद्रराजे भोसले की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए भेजा।
रविवार रात मंत्री भोसले, विधायक रोहित पवार और छात्रों के बीच बैठक हुई। पेपर लीक के आरोपों की जांच के लिए पांच सदस्यों की समिति बनाने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग मान ली गई। समिति के सचिव के तौर पर तुकाराम मुंढे का नाम बताया गया था, जिसे भी मंजूर किया गया। तय हुआ कि अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी किसी पूर्व न्यायमूर्ति को दी जाएगी। लेकिन भीमनवार के इस्तीफे पर कोई फैसला नहीं हुआ। ज्यादातर मांगों पर सरकार का रुख सकारात्मक था, इसलिए उम्मीद थी कि आंदोलन खत्म हो जाएगा। नेतृत्व कर रहे रोहित पवार और विश्वजीत कदम को भी यही उम्मीद थी।
मगर जमीनी तस्वीर अलग निकली। रोहित पवार और विश्वजीत कदम ने छात्रों के सामने मंजूर की गई मांगों की सूची पढ़कर सुनाई। जांच समिति, पेपर लीक की जांच और दोषियों पर कार्रवाई की जानकारी देकर वे आंदोलन वापस लेने की अपील करते, उससे पहले ही छात्रों ने फिर इस्तीफे का मुद्दा पकड़ लिया। उनका रुख था कि इस्तीफा दो, तभी आंदोलन खत्म करेंगे। छात्रों ने यह भी कहा कि मामले दर्ज होते हैं तो होने दो, पर इस्तीफे के बिना पीछे नहीं हटेंगे। इससे मंच पर पेच बढ़ गया और हाई वोल्टेज ड्रामा शुरू हो गया।
रोहित पवार ने छात्रों को कई बार समझाने की कोशिश की और सरकार की मानी हुई मांगों की अहमियत बताई। लेकिन छात्रों का गुस्सा कम नहीं हुआ और इस्तीफे की मांग पर नारेबाजी चलती रही। आखिर में आंदोलन को तीखी धार देने वाले विवेकानंद पाटील के हाथ में माइक दिया गया। उनके भाषण से छात्रों को शांत करने की कोशिश हुई, पर छात्र अपनी मांग पर डटे रहे। तब समझौते का रास्ता निकला। न्यायिक जांच चलने तक भीमनवार ने नैतिकता के आधार पर छुट्टी पर जाने का फैसला जाहिर किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसकी पोस्ट डाली, जिसके बाद आंदोलन खत्म करने का रास्ता खुल गया।
छात्रों ने साफ कहा कि आंदोलन स्थगित हुआ है, खत्म नहीं। उन्होंने चेतावनी दी कि सरकार ने उनके मन मुताबिक कार्रवाई नहीं की तो आंदोलन फिर शुरू होगा।
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