दुनिया का इमरजेंसी तेल स्टॉक तेजी से घटा, कमर्शियल भंडार में 6 अरब बैरल से कम बचा
युद्ध और सप्लाई में रुकावट के बीच सरकारों और कंपनियों ने 1 अरब बैरल से ज्यादा तेल निकाला, तत्काल इस्तेमाल लायक तेल 10 फीसदी या उससे कम।
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नई दिल्ली : दुनिया का इमरजेंसी तेल स्टॉक बहुत तेजी से खत्म हो रहा है। युद्ध और सप्लाई में आई रुकावटों की वजह से सरकारों और कंपनियों ने अपने भंडार से 1 अरब बैरल से ज्यादा तेल निकाल लिया है। अब दुनिया के कमर्शियल स्टॉक में 6 अरब बैरल से भी कम तेल बचा है। इसमें से सिर्फ 10 फीसदी या उससे कम तेल ऐसा है, जो तुरंत इस्तेमाल के लिए मिल सकता है।
इसका मतलब यह है कि झटका सहने के लिए बाजार के पास अब बहुत कम गुंजाइश बची है। अगर सप्लाई का कोई नया संकट खड़ा हुआ, तो तेल बाजार पर उसका असर सबसे ज्यादा पड़ सकता है। कीमतों पर बढ़ने का दबाव पहले से ही बना हुआ है।
यहां एक बात साफ रहे कि यह बात इमरजेंसी तेल स्टॉक की है, कुल तेल भंडार की नहीं। फिलहाल दुनिया के पास कुल मिलाकर तेल का पर्याप्त स्टॉक है। आंकड़ों के मुताबिक पूरी दुनिया में हर दिन करीब 10.3 से 10.5 करोड़ बैरल तेल खर्च होता है।
प्रति व्यक्ति औसत देखें तो यह खपत रोज करीब 0.53 यूएस गैलन बैठती है, यानी एक आदमी पर लगभग 2.5 लीटर। इस पूरी खपत में सबसे बड़ा हिस्सा डीजल का है। ईआईए के आंकड़ों के अनुसार डीजल और गैसऑयल की रोजाना खपत करीब 28.7 से 29 करोड़ बैरल है, जो कुल मांग का करीब 27 से 28 फीसदी है। इसे दुनिया की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जा सकता है, क्योंकि भारी मशीनें, लंबे रूट के ट्रक, मालवाहक जहाज, खेतों के ट्रैक्टर और पब्लिक ट्रांसपोर्ट, सब इसी पर चलते हैं।
पेट्रोल यानी मोटर गैसोलीन दूसरे नंबर पर है। ईआईए के आंकड़ों के मुताबिक उसकी रोजाना खपत करीब 26.5 से 27 करोड़ बैरल है और यह कुल मांग का करीब 25 फीसदी बैठती है। पेट्रोल का इस्तेमाल ज्यादातर प्राइवेट कार, मोटरसाइकिल और हल्के ट्रकों में होता है। पश्चिमी देशों में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की मांग बढ़ने से पेट्रोल की मांग बढ़ने की रफ्तार धीमी पड़ी है, फिर भी दुनिया भर में पेट्रोल की मांग ऊंची बनी हुई है।
ट्रांसपोर्ट में इस्तेमाल होने वाली शुद्ध ऊर्जा का करीब 74 फीसदी हिस्सा डीजल और पेट्रोल का है। एक तिहाई हिस्सा पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक का है। बाकी करीब 250 करोड़ बैरल प्रतिदिन में अवशिष्ट ईंधन तेल, डामर और लुब्रिकेंट जैसे उत्पाद आते हैं। इनका इस्तेमाल बड़े जहाज चलाने, सड़कें बनाने और इंजनों में चिकनाई के लिए होता है।
कुल मिलाकर, घटते इमरजेंसी स्टॉक और ऊंची खपत को देखते हुए आगे बड़ी किल्लत पैदा होने की आशंका जताई जा रही है।