देऊळगाव राजा में सीमोल्लंघन पर गुगुळा माता मंदिर चलने की अपील
दशहरे के सीमोल्लंघन की पुरानी परंपरा को फिर शुरू करने के लिए गीरोली बुद्रुक के गुगुळा देवी मंदिर जाने का आह्वान।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
श्री बालाजी महाराज यात्रा उत्सव हर साल की तरह फिर पास आ गया है। चारसौ साल पीछे देखें तो काफी बदलाव हुए हैं। मंडपोत्सव के अगले दिन दशहरा उत्सव होता है। उस दिन पांडवों का वनवास खत्म हुआ था। उन्होंने अपने शस्त्र आपटा और शमी के पेड़ पर छिपाकर रखे थे। विजय का आनंद मनाने के लिए उन्होंने वे शस्त्र पेड़ से वापस लाए। उसी तरह देऊळगाव राजा नगर में श्री बालाजी की पालकी रात को श्रवण नक्षत्र में सीमोल्लंघन के लिए आमना नदी के रास्ते गांव की प्रदक्षिणा पूरी करती है और अगले दिन मंदिर लौटती है। इस दिन गांव के सभी लोगों को मूल बालाजी की मूर्ति को हाथ लगाकर दर्शन करने की छूट रहती है।
इससे पहले शाम को गांव के बहुत से नौजवान टोलियों में दक्षिण दिशा की ओर जाते थे। पचास साल पहले आमणा नदी के उस पार पुराना श्मशान था और उसके भी आगे लंका का बाग और काळुंका माता का मंदिर था। लोग दर्शन के बाद आपटा और शमी के पेड़ के नीचे जाकर पेड़ की पूजा करते और पत्तियों को सोना-चांदी मानकर प्रसाद के तौर पर साथ लाते थे। जोशी ब्राह्मण उस पेड़ के नीचे बैठे रहते और तोड़ी हुई पत्तियां दे देते थे। लोग नए कपड़े पहनकर, सिर पर टोपी और माथे पर लाल तिलक लगाकर "बोल बालाजी महाराज की जय, लक्ष्मी रमण गोविंदा" के जोरदार नारे लगाते हुए सीमोल्लंघन करते थे।
वक्त के साथ आमना नदी में पानी ही नहीं रहा। उन दिनों रात को बालाजी की पालकी नदी में डुबोई जाती थी। पुल के नीचे काफी पानी रहता था और वहां खूब खेलने के बाद पालकी चबूतरे पर रखी जाती थी। इस मौके पर श्री तिरुपति बालाजी और वाशिम के बालाजी एक साथ आते हैं, ऐसी सबकी श्रद्धा थी। तीनों बालाजी के दर्शन का लाभ मिलता है, इसलिए बहुत ठंड में भी कई महिला-पुरुष आते थे। तब नदी में रेत थी और पात्र खुला था। वहां कुश्ती के अखाड़े लगते थे और बारूद भी बड़े पैमाने पर फोड़ा जाता था। यह दशहरा उत्सव देखने किनगाव राजा, सिंदखेडराजा, वाघरूळ जहागीर, लिमखेड, सावखेड तेजन और आसपास के पंचक्रोशी के कई लोग बैलगाड़ियां लेकर बड़ी तादाद में आते थे। नदी के ऊपरी हिस्से में सावखेड भोई में बांध बन गया और नदी का रूप बदल गया। अब नदी किनारे जोशी ब्राह्मण से पूजा करवाकर लोग शाम को आपटा की पत्तियां लाते हैं, पर अब यह संख्या बहुत कम हो गई है।
सब मानते हैं कि सीमोल्लंघन की यह परंपरा जारी रखना बहुत जरूरी है। आपटा और शमी लेकर आने के बाद सब बालाजी मंदिर में वही सोना चढ़ाकर दर्शन करते हैं, देवता को पेड़े और बर्फी बांटते हैं। घर पहुंचने पर घर की सुहागिन महिलाएं सबकी आरती उतारती हैं। घर के देवता को भी यह सोना चढ़ाया जाता है। लोग एक-दूसरे के यहां दर्शन के लिए जाकर आशीर्वाद लेते हैं और बड़ों को नमस्कार करके सीमोल्लंघन का असली आनंद पाते हैं।
पहले जैसा आनंद वापस पाने के लिहाज से अब काळुंका माता की जगह गुगुळा माता के दर्शन का सुझाव है। गांव की सीमा बढ़ गई है, गाड़ियों की सुविधा हो गई है और सड़कें बन गई हैं। पिंपळनेर के मारुति दर्शन के साथ पास की गीरोली बुद्रुक रोड पर गुगुला देवी मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ है। जगदंब की कृपा से स्थानीय गीरोली निवासी और देऊळगाव के प्राध्यापक स्वर्गीय वसंतराव मुळे पिंपळनेर और देवी के दर्शन को रोज जाते थे। उन्होंने प्रस्तावित ट्रस्ट स्थापित किया, नक्शा तैयार किया और मरम्मत की कोशिश की। गेवराई से सेवानिवृत्त होने के बाद प्राध्यापक प्रदीप मीनासे ने 2012 से श्री गुगुला देवी संस्थान ट्रस्ट, गिरोली बुद्रुक के अध्यक्ष का पद संभाला है।
गुगुळा माता कई लोगों की कुलदेवता हैं। चैत्र महीने में हर साल पूर्णिमा को हनुमान जयंती पर यहां बड़ी यात्रा लगती है। यहां काफी सुधार हुए हैं। तीनसौ साल पहले ईंट और चूने से बनी दो दीपमालाएं और उतनी ही पुरानी ईंट-चूने की धार्मिक पाठशाला आज भी अच्छी हालत में हैं। गुगुळा देवी की तलहटी में मारुति की एक पत्थर की मूर्ति है। इस मंदिर पर अभी छत नहीं है। कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर में जैसे सूर्य महालक्ष्मी का मुखदर्शन करता है, वैसे ही यहां भी फरवरी में देवी का सूर्य मुखदर्शन होता है और इस अद्भुत समारोह को देखने बहुत लोग आते हैं।
शेगांव की तर्ज पर विश्वस्त मंडली निष्पृह भाव से तन-मन-धन से विकास कर रही है। वहां गोरक्षण गोशाला, श्रीकृष्ण गोवर्धन ट्रस्ट गोशाला नाम से 2017 में शुरू की गई, जहां आज 100 से ऊपर गायों की देखभाल होती है। गांव के कुछ दानवीर लोग हर महीने हजारों रुपये देकर गायों के चारे का खर्च उठाते हैं। इसके अलावा बालोद्यान, ध्यानमंदिर विद्या तीर्थ, अखंड नंदादीप महोत्सव, बारह गाड़ियां खींचने की मन्नत, नवरात्रि का होमवन, पांच रंग के कमल के फूल, अन्नदान, पहाड़ी पर गुफा मंदिर, नया बना मंगल कार्यालय और पानी में गेम टायर से बने खेल दर्शकों को खींचते हैं। यहां वनसंपदा भी खूब ध्यान खींचती है, जिसमें शमी के 3 पेड़ और आपटा (देसी) का एक पेड़ है। इसलिए हर साल सीमोल्लंघन पर हर परिवार के बच्चों को ले जाने के लिए यह सबसे अच्छी जगह मिल गई है। पुरानी परंपरा फिर शुरू हो, इसके लिए हर कोई इस मौके का लाभ ले।
गुगला माता यानी महालक्ष्मी विद्यादेवी, यह उनका पहले का नाम है। परमपूज्य श्री वक्रतुंड महाराज कवीश्वर ने सौ साल से ज्यादा, यानी 120 साल पहले ब्रह्मांड पुराण के मानसोक्तर खंड में प्रकाशित देवालय ग्राम महात्म्य नाम के संस्कृत ग्रंथ की कथा में इसका विस्तार से वर्णन किया है। ऐसे समृद्ध परिसर में सीमोल्लंघन के दिन सपरिवार, सहपरिवार जाकर अखंड लक्ष्मी और विद्यावान होने का शुभ आशीर्वाद लें और पुण्यफल पाएं। जय जगदंबा।