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20:33 IST

अष्टमी पर होमहवन की पारंपरिक विधि: तैयारी से पूर्णाहुति तक पूरा क्रम

नवरात्रि की अष्टमी पर घरों और मंदिरों में होने वाले होमहवन की पारंपरिक पद्धति, सामग्री और मंत्र।

नवरात्रि में अष्टमी तिथि पर दुर्गादेवी की खास पूजा करने की परंपरा है। इस दिन कई घरों और मंदिरों में दुर्गाष्टमी पूजन के साथ होमहवन भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक विधि के साथ होमहवन करने से देवी का आशीर्वाद मिलता है और घर में सुख, शांति व समृद्धि बनी रहती है, ऐसी श्रद्धालुओं की श्रद्धा है।

इस पूजा में गणपति पूजन, कलश स्थापना, मातृका पूजन, अग्निस्थापना, नवग्रह पूजन और दुर्गा सप्तशती हवन जैसी कई विधियां शामिल होती हैं। आइए, अष्टमी पर होमहवन करने की पारंपरिक पद्धति को क्रम से देखते हैं।

सबसे पहले तैयारी। होमहवन शुरू करने से पहले पूजा का जरूरी सामान और यज्ञकुंड की व्यवस्था की जाती है। पारंपरिक तरीके में पूर्व दिशा में ईंटों की चौकोर रचना बनाकर यज्ञकुंड तैयार किया जाता है। उसमें शुद्ध मिट्टी और सुगंधित द्रव्य रखे जाते हैं। पास में एक पाटा रखकर उस पर चावल की 3 ढेरियां रखी जाती हैं।

इनमें से दो ढेरियों पर पानी से भरे तांबे के कलश रखे जाते हैं और उन कलशों पर चावल व सुपारी वाली थालियां रखी जाती हैं। इन कलशों की पूजा वरुणदेव के प्रतीक के तौर पर होती है। तीसरी ढेरी पर गणपति के प्रतीक के रूप में सुपारी रखी जाती है। पूजा के लिए फल, पान के पत्ते, छुहारा, बादाम, खोपरा, नारियल, फूल, हल्दी, कुमकुम, घी, तिल और समिधा का इंतजाम किया जाता है।

होमहवन की शुरुआत गणपति पूजन से होती है। पूजा में कोई विघ्न न आए, इसके लिए गणपति से प्रार्थना की जाती है और इस मंत्र का जप किया जाता है।

ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि। तन्नो दंती प्रचोदयात्॥

इसके बाद पुण्याहवाचन और कलशपूजन होता है। यजमान और उनकी पत्नी संकल्प लेकर परिवार के कल्याण, आरोग्य, सुख-समृद्धि और संकटों के निवारण के लिए देवी से प्रार्थना करते हैं। परंपरा के अनुसार इस मौके पर सुहागिनें यजमान दंपति की आरती उतारती हैं।

होमहवन बिना किसी रुकावट के पूरा हो, इसके लिए मातृका देवताओं का पूजन किया जाता है। पारंपरिक विधि में 17 सुपारियों को मातृका के रूप में स्थापित किया जाता है। फिर यज्ञकुंड के आसपास की जगह की स्थानशुद्धि की जाती है। कुछ परंपराओं में इसके लिए गोमूत्र, पंचगव्य और सफेद सरसों का इस्तेमाल होता है।

उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सरस्वती और दूसरे देवताओं का पूजन होता है। कलश के पास देवी की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित कर महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और नवदुर्गा का आवाहन किया जाता है। देवी की प्रार्थना और ध्यानमंत्र बोलने के बाद पीठदेवताओं का पूजन किया जाता है।

होमहवन का अहम पड़ाव अग्निस्थापना है। पारंपरिक पद्धति में अग्नि प्रज्वलित कर उसकी पूजा की जाती है। इसके लिए समिधा, घी और परंपरा के हिसाब से सही लकड़ियां इस्तेमाल होती हैं। हवन पूरा होने तक अग्नि को सुरक्षित तरीके से जलता रखा जाता है। इसके बाद नवग्रहों की शांति के लिए गंध और पुष्प अर्पित कर पूजा की जाती है। नवग्रह हवन में घी, तिल, चावल और समिधा अर्पित की जाती हैं और संबंधित मंत्रों का पठन किया जाता है।

अष्टमी के होमहवन में दुर्गा सप्तशती हवन का खास महत्त्व है। इसमें श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और नवदुर्गा की प्रसन्नता के लिए संकल्प किया जाता है। दुर्गा सप्तशती ग्रंथ का पूजन कर देवी के मंत्रों का पठन किया जाता है।

पारंपरिक विधि के मुताबिक गणपति को 'ॐ गं गणपतये स्वाहा' मंत्र से 108 आहुतियां दी जाती हैं। इसके बाद देवी को 'ॐ अंबिकायै स्वाहा' मंत्र से 108 आहुतियां अर्पित की जाती हैं। आगे दुर्गा सप्तशती के मंत्रों के अनुसार हवन होता है। इसमें चावल, तिल, सत्तू, समिधा, गन्ने के टुकड़े और सुगंधित पुष्प जैसी सामग्री परंपरा के अनुसार इस्तेमाल की जाती है।

हवन के अगले चरण में बलिदान विधि की जाती है। कुछ पारंपरिक पद्धतियों में देवी के सामने कोहड़ा अर्पित करने या काटने की प्रथा है। फिर नारियल और बाकी पूजा सामग्री अग्नि को अर्पित कर पूर्णाहुति दी जाती है।

पूर्णाहुति के बाद देवी को हल्दी, कुमकुम, गंध और फूल चढ़ाए जाते हैं। धूप, दीप और नैवेद्य दिखाकर देवी की आरती की जाती है। फिर प्रदक्षिणा कर कुमारिका पूजन और सुहागिन पूजन किया जाता है। कुछ परंपराओं में ब्लाउज़ पीस और नारियल देकर गोद भरने की पद्धति भी है।

पूजा के आखिर में कलश का पानी यजमान और परिवार के लोगों पर छिड़ककर देवी से सुख, शांति और आरोग्य की प्रार्थना की जाती है। होमकुंड की भस्म माथे पर लगाने की भी परंपरा है। उसके बाद तर्पण, मार्जन और देवता विसर्जन किया जाता है। गुरुजी को दक्षिणा देकर आशीर्वाद लिए जाते हैं।

एक जरूरी बात। होमहवन के मंत्र, आहुतियों की संख्या और पूजा का क्रम कुलाचार, प्रदेश और संप्रदाय के हिसाब से बदल सकता है। इसलिए अष्टमी का होमहवन करते वक्त अपने घर की परंपरा के अनुसार जानकार गुरुजी से मार्गदर्शन लेना चाहिए। अग्नि का इस्तेमाल करते समय सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।

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