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21:14 IST

कोराडी के महालक्ष्मी जगदंबा मंदिर में नवरात्रि पर जलती हैं 7,500 अखंड ज्योतियां

नागपुर से करीब 15 किलोमीटर दूर कोराडी का श्री महालक्ष्मी जगदंबा माता मंदिर विदर्भ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। नवरात्रि में यहां खास पूजा होती है और बड़ी तादाद में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

कोराडी के महालक्ष्मी जगदंबा मंदिर में नवरात्रि पर जलती हैं 7,500 अखंड ज्योतियां तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

महाराष्ट्र के नागपुर जिले में कोराडी का श्री महालक्ष्मी जगदंबा माता मंदिर विदर्भ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। यह मंदिर नागपुर शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर है। यहां पूरे साल श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, और नवरात्रि के दौरान खास पूजा-अर्चना होती है। उस वक्त बड़ी संख्या में भक्त मां का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। मंदिर की पहचान स्थानीय लोककथाओं, धार्मिक मान्यताओं और इलाके के ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़ी है।

मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, पुराने जमाने में कोराडी इलाके को जाखापुर कहा जाता था और यहां राजा झोलन का शासन था। उनके सात बेटे थे, लेकिन बेटी नहीं थी। बेटी की चाहत में राजा ने यज्ञ, हवन और तपस्या की। मान्यता है कि इसके बाद रानी गंगासागर ने एक कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम जाखुमाई बताया जाता है। लोककथा में जाखुमाई को देवी शक्ति का स्वरूप माना गया है।

एक प्रचलित कथा के अनुसार, राजकुमारी जाखुमाई ने पड़ोसी राज्य के राजा के साथ हुई लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। लड़ाई के बाद राज्य लौटते वक्त सूरज ढलने पर उन्होंने एक जगह रुकने का फैसला किया। इस जगह को आज के कोराडी से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहीं जाखुमाई मां महालक्ष्मी जगदंबा के दिव्य स्वरूप में प्रकट हुईं। मंदिर में विराजमान देवी की प्रतिमा को श्रद्धालु स्वयंभू मानते हैं। यह विवरण धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, प्रमाणित ऐतिहासिक घटना नहीं।

मंदिर के इतिहास को लेकर उपलब्ध स्थानीय विवरणों में नागपुर के भोसले मराठा राजवंश के शासनकाल का जिक्र मिलता है। मंदिर के जीर्णोद्धार का संबंध 17वीं शताब्दी से बताया जाता है, हालांकि इसकी मूल स्थापना की सही तारीख साफ नहीं है। मंदिर परिसर के प्रबंधन के लिए श्री महालक्ष्मी जगदंबा संस्थान की स्थापना 24 जुलाई 1987 को की गई थी।

करीब 150 एकड़ में फैला यह देवस्थान अपने विशाल परिसर के लिए जाना जाता है। यहां भव्य प्रवेश द्वार, दर्शन के लिए लंबी कतारें, दीपस्तंभ, सभामंडप और धार्मिक गतिविधियों के लिए कई जगहें हैं। मंदिर के पास कोराडी झील है, जो आसपास की खूबसूरती बढ़ाती है। रात में मंदिर की रोशनी उसकी भव्यता को और निखार देती है। श्रद्धालुओं की सहूलियत के लिए परिसर में सफाई, सुरक्षा और दूसरे जरूरी इंतजाम भी किए गए हैं।

श्रद्धालुओं के बीच एक खास मान्यता यह भी है कि यहां विराजमान मां महालक्ष्मी जगदंबा की स्वयंभू प्रतिमा दिन में तीन अलग-अलग स्वरूपों में दर्शन देती है। भक्त इन स्वरूपों को देवी की दिव्य शक्ति और महिमा से जोड़कर देखते हैं। मान्यता के मुताबिक, मां के इन रूपों में उनके अलग-अलग गुणों और शक्तियों की झलक मिलती है। इसी वजह से यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए देवी के दर्शन का खास महत्व है।

नवरात्रि के दौरान कोराडी मंदिर में अखंड ज्योतियों का खास धार्मिक महत्व है। इस मौके पर मंदिर परिसर के विशेष ज्योत भवन में श्रद्धालुओं की ओर से करीब 7,500 अखंड मनोकामना ज्योतियां प्रज्वलित की जाती हैं। इन दीपकों को मां जगदंबा के प्रति आस्था और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। एक साथ जलती इतनी ज्योतियां पूरे परिसर को भक्तिमय माहौल से भर देती हैं।

नवरात्रि के पहले दिन जलाई जाने वाली इन अखंड मनोकामना ज्योतियों को पूरे उत्सव के दौरान लगातार जलाए रखने की परंपरा है। इनकी देखरेख के लिए खास व्यवस्था की जाती है, ताकि तेल या घी की कमी से दीपक बुझने न पाएं। श्रद्धालु अपने और परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ये ज्योतियां जलवाते हैं।

इसके अलावा मां जगदंबा के सामने एक मुख्य अखंड महाज्योति भी जलती है। मंदिर संस्थान से जुड़ी जानकारी के अनुसार, इस महाज्योति को सालभर, यानी 365 दिन जलाए रखने की व्यवस्था की गई है। इसे भक्तों की अटूट श्रद्धा और देवी के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

जो श्रद्धालु अपने या अपने परिवार के नाम से अखंड मनोकामना ज्योति जलवाना चाहते हैं, वे मंदिर संस्थान के जरिए इसकी व्यवस्था कर सकते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसके लिए Rs 2,100 शुल्क का उल्लेख मिलता है।

नवरात्रि के दौरान मंदिर में पूजा, आरती और कई धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग से जुड़ी जानकारी में इस मौके पर करीब 20 लाख या उससे ज्यादा श्रद्धालुओं के पहुंचने का जिक्र मिलता है। भक्त मां महालक्ष्मी जगदंबा को शक्ति, समृद्धि और संरक्षण का प्रतीक मानते हैं। नागपुर के अलावा महाराष्ट्र के दूसरे जिलों और अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।

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