खेत की मेड़ पर क्यों होता है म्हसोबा का मंदिर, गांव का रखवाला देव कौन है
महाराष्ट्र के गांवों में खेतों की मेड़ पर बसे म्हसोबा को खेती, मवेशियों और गांव की रखवाली करने वाला क्षेत्रपाल देव माना जाता है।
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महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों से आते हों तो म्हसोबा का नाम आपने जरूर सुना होगा। गांव-देहात में, खेतों की मेड़ों पर यह देव बसा होता है। बड़ा मंदिर भले न हो, पर म्हसोबा का छोटा-सा थान लगभग हर जगह मिल जाता है। इस रखवाले म्हसोबा को करीब से समझने की कोशिश करते हैं।
म्हसोबा सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं हैं। कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश के कुछ हिस्सों में भी यह क्षेत्रपाल देव मिलते हैं। दक्षिण भारत के इन हिस्सों में उन्हें दूसरे नाम से भी जाना जाता है। दूसरे मंदिरों के देवताओं से यह जरा अलग हैं। खुरदरे पत्थर पर लाल-केसरिया सिंदूर पुता होता है। इस म्हसोबा का इतिहास शिवराय के जमाने में भी दर्ज किया गया था।
म्हसोबा शब्द को तोड़ें तो वह महिष और बा बनता है। यानी भैंस, गाय जैसे मवेशियों और खेती-बाड़ी का बाप, किसी बड़े-बुजुर्ग की तरह रखवाली करने वाला क्षेत्रपाल देव। इसी वजह से म्हसोबा का थान दूर खेत की मेड़ पर होता है।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर रोज़ालिंड ओ'हैनलन के मुताबिक महाराष्ट्र में मराठा समाज के बीच म्हसोबा की परंपरागत उपासना बड़े पैमाने पर चलती रही है। 19वीं सदी के मराठा समाज की श्रद्धा का ब्यौरा देते हुए वे बताती हैं कि गांव के परिसर में म्हसोबा के नाम पर कोई पत्थर स्थापित करना, उस पर सिंदूर लगाना और धूप चढ़ाना कई परिवारों की परंपरा थी। वे यह भी बताती हैं कि खेती का काम शुरू करते समय बुवाई के लिए बीज लेना, खेत में बखराई करना या मड़ाई के बाद अनाज का माप लेना, ऐसे अहम मौकों पर म्हसोबा का नाम लेने की प्रथा थी। गांव-बस्ती की रखवाली करने वाले, मवेशियों पर नजर रखने वाले और फसल अच्छी पकने का आशीर्वाद देने वाले देव के रूप में म्हसोबा की उपासना को मान्यता मिली हुई है।
भोसले घराने में भी म्हसोबा की उपासना किए जाने के उल्लेख मिलते हैं। पुरंदर किले पर म्हसोबा का एक देवस्थान है और पास के जलाशय को 'म्हसोबा टंकी' भी कहा जाता है। म्हसोबा के देवस्थान मुख्य रूप से लोकपरंपरा से जुड़े हैं और संस्कृत धार्मिक साहित्य में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता। उन्हें खेती और जमीन की रक्षा करने वाला 'क्षेत्रपाल' देवता माना जाता है। कुछ लोकश्रद्धाओं के अनुसार म्हसोबा को सप्तनदी देवताओं, यानी 'सात आसरा' के रक्षक भाई के रूप में भी पूजा जाता है।
कुछ लोकपरंपराओं में माना जाता है कि म्हसोबा श्री शंकर का अवतार हैं। 'महिष' या 'महेश' नामों से उनका संबंध जोड़ा जाता है। महाराष्ट्र में म्हसोबा की उपासना में उनकी पत्नी जोगुबाई की भी पूजा होती है। कुछ परंपराओं में जोगुबाई का संबंध दुर्गादेवी से जोड़ा जाता है। कई जगहों पर म्हसोबा के थान गांव के बाहर या श्मशानभूमि के परिसर में भी होते हैं। लोकश्रद्धा के अनुसार म्हसोबा बुरी शक्तियों से बचाने वाले देव माने जाते हैं।
धनगर, मांग, चांभार और दूसरे समुदायों की धार्मिक परंपराओं में म्हसोबा को खास जगह मिली है। कई जगहों पर मन्नत पूरी होने पर बकरे की बलि देने की प्रथा मिलती है, जबकि कुछ जगहों पर सिर्फ श्रीफल यानी नारियल चढ़ाया जाता है। म्हसोबा की यात्रा के दौरान पालकी में देव की शोभायात्रा निकाली जाती है और भक्त बड़ी श्रद्धा से उसमें शामिल होते हैं। इस तरह म्हसोबा की उपासना महाराष्ट्र के ग्रामदेवताओं की परंपरा, खेती से जुड़ी श्रद्धा और स्थानीय लोकसंस्कृति का अहम हिस्सा है।