डायबिटीज़ वालों के हेल्थ इंश्योरेंस में पहले से मौजूद बीमारी की शर्तें सबसे अहम
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हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी चुनते वक्त डायबिटीज़ के साथ जी रहे लोगों को वेटिंग पीरियड, सब-लिमिट और अपवाद जैसी शर्तें देखनी पड़ती हैं।
डायबिटीज़ के साथ जी रहे लोगों के लिए डॉक्टर से सलाह, जांच, दवाइयां और दूसरे खर्च रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी देखते वक्त सिर्फ बीमा राशि और प्रीमियम ही मायने नहीं रखते। यह जानना भी ज़रूरी है कि पॉलिसी पहले से मौजूद बीमारी को किस नज़र से देखती है।
पॉलिसी के लिए आवेदन करते समय अगर किसी को डायबिटीज़ पहले से है, तो पॉलिसी की शर्तों और उसकी मेडिकल हिस्ट्री के हिसाब से इसे पहले से मौजूद बीमारी (pre-existing disease) माना जा सकता है। इसका असर कवर पर लागू होने वाली शर्तों पर पड़ सकता है। पहले से मौजूद बीमारियों के लिए पॉलिसी में वेटिंग पीरियड हो सकता है, और यह अवधि अलग-अलग पॉलिसी में अलग हो सकती है। चुने गए कवर के मुताबिक दूसरी शर्तें भी लागू हो सकती हैं। इसलिए पॉलिसी खरीदने से पहले यह देखना होता है कि वह पहले से मौजूद बीमारी की क्या परिभाषा देती है, कौन-सा वेटिंग पीरियड लगता है और मौजूदा बीमारी से जुड़ी कोई और शर्त तो नहीं है।
कुछ बीमा कंपनियां खास बीमारियों वाले लोगों के लिए अलग पॉलिसी या फायदे देती हैं। वहीं कुछ दूसरी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियां डायबिटीज़ वालों को अपनी आम शर्तों के तहत कवर कर सकती हैं। फीचर और शर्तें एक प्रोडक्ट से दूसरे में बदलती हैं।
पॉलिसी के हिसाब से कई चीज़ें मिल सकती हैं। पहले से मौजूद बीमारी की शर्तों में पॉलिसी शुरू होने से पहले की बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड तय हो सकता है। अस्पताल में भर्ती होने का कवर हो तो पात्र खर्च पॉलिसी की शर्तों, सीमाओं और अपवादों के दायरे में कवर हो सकते हैं। कुछ पॉलिसियों में तय जांच या ओपीडी के फायदे भी शामिल हो सकते हैं। कुछ पॉलिसियां अपनी बताई शर्तों के साथ वेलनेस प्रोग्राम या उनसे जुड़े फायदे दे सकती हैं। कुछ इलाज या सेवाओं पर सब-लिमिट या दूसरी पाबंदियां भी लग सकती हैं। असल बात यह है कि सिर्फ डायबिटीज़ होने से यह तय नहीं होता कि पॉलिसी में क्या कवर है। पॉलिसी की असली शर्तें ही मायने रखती हैं।
अलग-अलग हेल्थ इंश्योरेंस प्लान की तुलना करें तो वे पहले से मौजूद बीमारी की परिभाषा, वेटिंग पीरियड लगाने के तरीके, खास फायदों, और सीमाओं व अपवादों में एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं। सिर्फ पॉलिसी की श्रेणी देखने के बजाय उन शर्तों की तुलना करनी चाहिए जो मौजूदा बीमारी पर लागू होती हैं। तुलना में पहले से मौजूद बीमारी की शर्तें, उन पर लागू वेटिंग पीरियड, आउटपेशेंट फायदे यानी कंसल्टेशन या जांच कवर होती है या नहीं, किसी इलाज या सेवा की अलग सब-लिमिट है या नहीं, और कौन-सी बीमारियां, इलाज या खर्च कवर नहीं हैं, ये पांच बातें आती हैं।
पॉलिसी चुनने से पहले यह भी देखना होता है कि मेडिकल जांच करानी पड़ेगी या मेडिकल रिपोर्ट जमा करनी पड़ेगी या नहीं। साथ ही यह भी कि किसी मंज़ूर क्लेम का तय प्रतिशत खुद भरना पड़ेगा या नहीं, यानी को-पेमेंट। रिन्यूअल के वक्त लागू होने वाली शर्तें भी देखी जानी चाहिए। जिनके पास पहले से हेल्थ इंश्योरेंस है, वे मौजूदा कवर बदलने से पहले शर्तें परखें। पोर्टेबिलिटी की अपनी खास ज़रूरतें हो सकती हैं, इसलिए कोई कदम उठाने से पहले संबंधित पॉलिसी दस्तावेज़ देखे जाने चाहिए।
कुल मिलाकर, डायबिटीज़ होने भर से यह पता नहीं चलता कि कोई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ज़रूरत के हिसाब से ठीक बैठेगी या नहीं। फर्क इससे पड़ता है कि पॉलिसी मौजूदा बीमारी के साथ कैसे पेश आती है, यानी उसके वेटिंग पीरियड, अपवाद, सीमाएं और बाकी लागू शर्तें क्या हैं। चुनाव से पहले ये ब्योरे पढ़ने से समझ आता है कि कवर क्या देता है और कौन-सी शर्तें पूरी करनी होंगी।
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