मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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18:59 IST

ULIP कैलकुलेटर से रिटर्न का अंदाजा और टैक्स नियमों की जानकारी कैसे मिलती है

ULIP में इंश्योरेंस और मार्केट-लिंक्ड इनवेस्टमेंट दोनों साथ मिलते हैं, और कैलकुलेटर से पैसा कितना बढ़ सकता है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

ULIP कैलकुलेटर से रिटर्न का अंदाजा और टैक्स नियमों की जानकारी कैसे मिलती है
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

ULIP यानी एक ऐसा फाइनेंशियल प्रोडक्ट है जिसमें इंश्योरेंस और मार्केट-लिंक्ड इनवेस्टमेंट, दोनों का फायदा एक साथ मिलता है। प्रीमियम का एक हिस्सा लाइफ इंश्योरेंस कवर देने में लगता है, और चार्जेस व अलॉकेशन के बाद जो रकम बचती है, वो मार्केट-लिंक्ड फंड्स में इनवेस्ट हो जाती है। यह पैसा डेट फंड, इक्विटी फंड या बैलेंस्ड फंड में लगाया जाता है, और यह इस बात पर डिपेंड करता है कि इनवेस्टर का फाइनेंशियल गोल क्या है, रिस्क कितना लेना है और कितने समय के लिए इनवेस्ट करना है।

कोई भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट लेने से पहले उसका कॉस्ट, रिस्क, फीचर और मुमकिन रिटर्न जानना जरूरी होता है। इसी में काम आता है ULIP कैलकुलेटर - एक ऑनलाइन टूल, जो प्रीमियम अमाउंट, अंदाजन रिटर्न रेट और इनवेस्टमेंट टेन्योर जैसी चीजों के आधार पर बताता है कि इनवेस्टमेंट की वैल्यू आगे चलकर कितनी हो सकती है। यह अलग-अलग सिनेरियो में कितना कॉर्पस बन सकता है, इसका अंदाजा देकर फाइनेंशियल प्लानिंग में मदद करता है।

ULIP कैलकुलेटर काम कैसे करता है, यह चार स्टेप में समझा जा सकता है। पहले प्रीमियम अमाउंट, पॉलिसी टेन्योर, प्रीमियम पेमेंट की फ्रीक्वेंसी और अंदाजन रिटर्न रेट जैसी जरूरी जानकारी जुटानी होती है। फिर एज, प्रीमियम अमाउंट, पॉलिसी टेन्योर, एक्सपेक्टेड रिटर्न रेट और प्रीमियम पेमेंट टेन्योर जैसी डिटेल्स डालनी होती हैं। इसके बाद कैलकुलेटर डाली गई जानकारी और मान लिए गए एस्टीमेट के आधार पर अंदाजन इनवेस्टमेंट वैल्यू या कॉर्पस बता देता है। और आखिर में, प्रीमियम अमाउंट या पॉलिसी टेन्योर बदलकर, या अलग-अलग रिटर्न रेट आजमाकर, अलग-अलग सिनेरियो भी देखे जा सकते हैं, जिससे फाइनेंशियल गोल के हिसाब से सही फैसला लेने में मदद मिलती है।

ULIP का रिटर्न निकालने के लिए दो फॉर्मूला काम में लिए जाते हैं। पहला है एब्सोल्यूट रिटर्न, जो यह बताता है कि किसी तय समय में ULIP की वैल्यू कितने पर्सेंट बढ़ी या घटी। फॉर्मूला है - (करंट वैल्यू माइनस इनिशियल इनवेस्टमेंट वैल्यू) भाग खरीदते वक्त की वैल्यू, गुणा 100। जैसे अगर इनिशियल NAV 250 रुपए था और करंट ULIP NAV 350 रुपए है, तो एब्सोल्यूट रिटर्न {(350-250)/250}x100, यानी 40 पर्सेंट निकलता है।

दूसरा फॉर्मूला है CAGR यानी कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट, जो यह बताता है कि तय समय में इनवेस्टमेंट सालाना औसतन कितना बढ़ा। फॉर्मूला है - {[(करंट वैल्यू भाग खरीदते वक्त की वैल्यू) पावर (1 भाग सालों की संख्या)] माइनस 1} गुणा 100। जैसे अगर इनिशियल NAV 25 रुपए था, 5 साल बीते और करंट ULIP NAV 35 रुपए है, तो CAGR {[(35/25)^(1/5)]-1}x100, यानी 6.96 पर्सेंट निकलता है।

ULIP कैलकुलेटर यूज करते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। प्रीमियम अमाउंट अपने बजट और गोल के हिसाब से चुनना चाहिए, जो पॉलिसी टेन्योर के दौरान हर महीने या हर साल भरना होता है। पॉलिसी टेन्योर भी लंबे समय के फाइनेंशियल गोल के हिसाब से तय करना चाहिए, क्योंकि लंबा इनवेस्टमेंट होरिजन इनवेस्टमेंट को बढ़ने का ज्यादा टाइम देता है, हालांकि यह मार्केट की परफॉर्मेंस पर डिपेंड करता है। इक्विटी-ओरिएंटेड फंड में ग्रोथ की पोटेंशियल ज्यादा होती है, लेकिन रिस्क भी ज्यादा रहता है, जबकि डेट फंड में मार्केट रिस्क कम और रिटर्न स्टेबल रहता है, हालांकि असली रिटर्न मार्केट की कंडीशन पर डिपेंड करता है। एडमिनिस्ट्रेटिव फीस, मॉर्टेलिटी चार्ज, फंड मैनेजमेंट फीस जैसे चार्ज भी समझ लेने चाहिए, ताकि अलग-अलग प्लान का सही कंपैरिजन हो सके। और कैलकुलेटर में रिटर्न रेट भी एक रीजनेबल फिगर ही डालना चाहिए, ताकि रिजल्ट रियलिस्टिक रहे और गैर-जरूरी उम्मीद न बने।

टैक्स की बात करें तो ULIP में लाइफ इंश्योरेंस कवर के साथ मार्केट-लिंक्ड इनवेस्टमेंट का फायदा तो मिलता ही है, टैक्स ट्रीटमेंट इनकम टैक्स एक्ट 1961 के प्रोविजन पर डिपेंड करता है। अगर ULIP 1 फरवरी 2021 या उसके बाद इश्यू हुआ है, तो सेक्शन 10(10D) के तहत छूट सालाना 2.5 लाख रुपए की प्रीमियम लिमिट के साथ ही मिलती है, बाकी तय शर्तों के अलावा। अगर एक से ज्यादा ULIP हैं, तो छूट तय करने के लिए सबका टोटल प्रीमियम जोड़कर देखा जाता है, तय शर्तों के मुताबिक। डेथ बेनिफिट पर छूट को अलग से, लागू प्रोविजन के तहत देखा जाता है। इसलिए टैक्स ट्रीटमेंट तय करने से पहले प्रीमियम अमाउंट, पॉलिसी इश्यू डेट, लागू टैक्स प्रोविजन और पॉलिसी की शर्तें एक बार देख लेनी चाहिए। अगर ULIP से मिली रकम टैक्सेबल है, तो टैक्स देनदारी संबंधित असेसमेंट ईयर के टैक्सेबल इनकम और लागू इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से निकाली जा सकती है।

कुल मिलाकर ULIP में लाइफ इंश्योरेंस कवर और मार्केट-लिंक्ड इनवेस्टमेंट, दोनों साथ मिलते हैं और इसे लंबे समय की फाइनेंशियल प्लानिंग के हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है। इनवेस्ट करने से पहले प्लान की बेसिक शर्तें समझनी चाहिए और अपनी फाइनेंशियल सिचुएशन, गोल और आगे की जिम्मेदारियां भी ध्यान में रखनी चाहिए। सही फैसले के लिए फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लेने की सलाह दी जाती है।

पुराने टैक्स रिजीम के तहत इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80C में सालाना 1.5 लाख रुपए तक भरे गए प्रीमियम पर टैक्स डिडक्शन का दावा किया जा सकता है, तय शर्तों के मुताबिक - यह लिमिट PPF, लाइफ इंश्योरेंस प्रीमियम, ELSS जैसे बाकी इनवेस्टमेंट को मिलाकर कुल 1.5 लाख रुपए की ही रहती है। ULIP कैलकुलेटर से इनवेस्टर यह समझ पाते हैं कि प्रीमियम अमाउंट और इनवेस्टमेंट टेन्योर का अंदाजन कॉर्पस पर क्या असर पड़ता है, डाली गई डिटेल्स के आधार पर मुमकिन इनवेस्टमेंट वैल्यू का अंदाजा लगा पाते हैं, अपने फाइनेंशियल गोल तय कर पाते हैं, यह देख पाते हैं कि प्लान किया गया इनवेस्टमेंट अमाउंट उनके गोल से मैच करता है या नहीं, और अलग-अलग एस्टीमेट बदलकर अलग-अलग इनवेस्टमेंट सिनेरियो का कंपैरिजन भी कर पाते हैं।

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