दशहरे पर शमी पूजन और आपटा की पत्तियां सोना क्यों कहलाती हैं, पांडव और कौत्स की कथा
दशहरे पर शमी पूजन और शस्त्र पूजा की परंपरा से जुड़ी पांडवों और कौत्स ऋषि की प्रचलित कथाएं।
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दशहरे पर शमी पूजन और शस्त्र पूजा करने की परंपरा चली आ रही है। इस परंपरा से जुड़ी दो कथाएं बताई जाती हैं। एक महाभारत के पांडवों की है और दूसरी कौत्स ऋषि और राजा रघु की।
महाभारत में पांडवों की जिंदगी में वनवास और अज्ञातवास की खास जगह है। जुए में हारने के बाद उन्हें बारह साल का वनवास और उसके बाद एक साल का अज्ञातवास भोगना पड़ा। अगर अज्ञातवास के दौरान उनकी पहचान खुल जाती, तो उन्हें दोबारा वनवास में जाना पड़ता।
इसी वजह से पांडव विराट राजा के मत्स्य देश में अलग-अलग रूप धरकर रहे। युधिष्ठिर ने कंक, भीम ने बल्लव, अर्जुन ने बृहन्नला, नकुल ने ग्रंथिक और सहदेव ने तंतिपाल का रूप लिया। द्रौपदी ने सैरंध्री बनकर विराट राजा की पत्नी की सेवा स्वीकार की।
प्रचलित पौराणिक परंपरा की कथा के मुताबिक अज्ञातवास में जाने से पहले पांडवों ने अपने हथियार एक शमी के पेड़ पर सुरक्षित रख दिए थे। अर्जुन का गांडीव धनुष और बाकी शस्त्र इसी पेड़ पर रखे गए थे।
अज्ञातवास के आखिर में कौरवों ने विराट राजा की गायों पर हमला कर दिया। तब अर्जुन ने बृहन्नला का रूप छोड़कर अपनी असली पहचान जाहिर की। उन्होंने शमी के पेड़ पर रखे हथियार वापस लिए और विराट के राजकुमार उत्तर की मदद से कौरवों की सेना का मुकाबला किया।
इस प्रसंग में अर्जुन की बहादुरी, कर्तव्यनिष्ठा और सही वक्त पर ताकत का इस्तेमाल करने की सोच दिखती है। शमी के पेड़ से हथियार वापस लेकर जंग के लिए तैयार होने की इस कथा से विजयादशमी पर शस्त्र पूजा और शमी पूजन की परंपरा को जोड़ा जाता है। हालांकि महाभारत के बयान से पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि पांडवों का अज्ञातवास जिस दिन खत्म हुआ, वह आज की विजयादशमी ही थी।
दूसरी कथा कौत्स की है। पुराने जमाने में गुरुकुल में पढ़ाई होती थी। विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर अलग-अलग विद्याएं सीखते थे और पढ़ाई पूरी होने पर गुरु की आज्ञा से आगे की जिंदगी शुरू करते थे। गुरु के ऋण से मुक्त होने के लिए गुरुदक्षिणा देने की परंपरा भी थी।
पौराणिक कथा के मुताबिक कौत्स नाम का एक समझदार और विनम्र विद्यार्थी वरतंतू ऋषि के आश्रम में पढ़ता था। उसने गुरु के मार्गदर्शन में चौदह विद्याएं सीखीं। पढ़ाई पूरी होने पर उसने गुरु के चरणों में झुककर गुरुदक्षिणा देने की इच्छा जताई।
वरतंतू ऋषि ने पहले दक्षिणा लेने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि कौत्स का ज्ञान, उसकी निष्ठा और अच्छा आचरण ही उनके लिए संतोष की बात है। फिर भी कौत्स अपने फैसले पर अड़ा रहा।
आखिर शिष्य की जिद देखकर वरतंतू ऋषि ने उससे चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राओं की गुरुदक्षिणा मांगी। इस प्रचलित कथा में बताया जाता है कि चौदह विद्याओं में से हर विद्या के लिए एक करोड़ सुवर्ण मुद्रा तय की गई थी। गुरु की आज्ञा सिर आंखों पर रखने वाले कौत्स ने दक्षिणा देने का पक्का इरादा किया, पर सवाल था कि इतनी सुवर्ण मुद्राएं आएंगी कहां से।
तब कौत्स को अयोध्या के राजा रघु की याद आई। रघु अपनी दानशीलता के लिए मशहूर थे और उनके दरबार से कोई याचक निराश नहीं लौटता था। कौत्स रघु के दरबार पहुंचा, लेकिन उस वक्त राजा की हालत अलग थी। राजा ने हाल ही में विश्वजित यज्ञ किया था और यज्ञ के बाद सारी संपत्ति दान करने की परंपरा निभाते हुए अपना सारा धन दान कर दिया था। इसलिए कौत्स को देने लायक सुवर्ण मुद्राएं उनके पास नहीं बचीं।
फिर भी रघु को अपने द्वार आए याचक को खाली हाथ भेजना मंजूर नहीं था। उन्होंने कौत्स की जरूरत समझी और उससे कुछ समय रुकने को कहा। राजा ने ठान लिया कि कौत्स की मदद करनी ही है। अपने पास दौलत न होने पर भी वे अपने पराक्रम और ताकत के दम पर जरूरी धन जुटाने को तैयार थे।
वचन पूरा करने के लिए रघु ने धन के स्वामी माने जाने वाले कुबेर से सुवर्ण मुद्राएं लेने का सोचा और इसके लिए जंग की तैयारी का फैसला किया। रघु का पराक्रम और उनका पक्का संकल्प देखकर कुबेर ने टकराव का रास्ता टाल दिया और अयोध्या में सुवर्ण मुद्राओं की बारिश कर दी। इस कथा में आपटा और शमी के पेड़ों पर सुवर्ण मुद्राएं बरसने का जिक्र मिलता है। इस तरह रघु को कौत्स की गुरुदक्षिणा के लिए जरूरी धन मिल गया।