नवरात्रि का नौवां दिन सिद्धीदात्री देवी को समर्पित, जानिए पूजा की विधि
सोमवार, 19 अक्टूबर को शारदीय नवरात्रि का नौवां दिन है और यह सिद्धीदात्री देवी को समर्पित है।
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सोमवार, 19 अक्टूबर को शारदीय नवरात्रि का नौवां दिन है। यह दिन सिद्धीदात्री देवी को समर्पित है। नवदुर्गा के नौ रूपों में इसे आखिरी रूप माना जाता है। इस दिन कुछ जगहों पर कन्या पूजन भी किया जाता है और देवी को अलग-अलग चीजों का नैवेद्य दिखाया जाता है।
नवरात्रि के नौवें दिन देवी सिद्धीदात्री की पूजा होती है। सिद्धीदात्री को दुर्गा का नौवां और अंतिम स्वरूप माना जाता है। देवी को सिद्धी, ज्ञान, बुद्धि और अध्यात्मिक शक्ति देने वाली देवी कहा जाता है। आखिरी दिन मनोभाव से देवी की पूजा करके नौ दिनों की उपासना का समापन किया जा सकता है।
इस बार नवमी के दिन का रंग मोरपंखी है। इस रंग को शांति, सौंदर्य, सकारात्मकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। मोरपंखी रंग में हरे और नीले, दोनों रंगों का सुंदर मेल है। इसी वजह से इसे प्रकृति, संतुलन, स्थिरता और प्रसन्नता से भी जोड़ा जाता है। नवरात्रि के रंगों के क्रम के हिसाब से इस दिन मोरपंखी रंग के कपड़े पहनकर देवी की पूजा करने की परंपरा निभाई जा सकती है।
नैवेद्य की बात करें तो देवी सिद्धीदात्री को तिल चढ़ाने की परंपरा है। तिल के लड्डू या तिल से बना सात्विक व्यंजन नैवेद्य के तौर पर चढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा इस दिन खीर, हलवा, पुरी, नारियल के व्यंजन और फल भी नैवेद्य के रूप में रखे जा सकते हैं।
नवमी के दिन भी कई जगहों पर कन्या पूजन किया जाता है। कई जगहों पर कन्याओं को देवी का रूप मानकर उन्हें भोजन, फल, मिठाई और भेंट देने की प्रथा है। श्रद्धा के साथ "ओम देवी सिद्धीदात्रेय नमः" मंत्र का जाप करके सुख, शांति, आरोग्य, समृद्धि और परिवार की भलाई के लिए देवी से प्रार्थना की जानी चाहिए।
स्वरूप की बात करें तो सिद्धीदात्री नवदुर्गा का आखिरी रूप हैं। वे भक्तों को सिद्धी, ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक शक्ति देती हैं। "सिद्धी" यानी खास आध्यात्मिक क्षमता और "दात्री" यानी देने वाली, इसलिए सिद्धीदात्री नाम का मतलब है सिद्धी प्रदान करने वाली देवी। देवी कमल पर विराजमान हैं। उनके चार हाथ हैं, जिनमें शंख, चक्र और गदा है। कमल को पवित्रता और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है।
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