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08:22 IST

गौरी इंगवले बोलीं, हर लड़की को कभी न कभी चंडिका बनना ही पड़ता है

'दशमी' फिल्म में लक्ष्मी बनीं अभिनेत्री गौरी इंगवले ने नवरात्र के मौके पर महिलाओं की सुरक्षा और ताकत पर खुलकर बात की।

गौरी इंगवले बोलीं, हर लड़की को कभी न कभी चंडिका बनना ही पड़ता है तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

'दशमी' फिल्म जल्द ही रिलीज हो रही है और इसमें मुख्य भूमिका अभिनेत्री गौरी इंगवले ने निभाई है। गौरी अब तक जैसे किरदार करती आई हैं, लक्ष्मी का यह रोल उनसे काफी अलग है। अभी नवरात्र चल रहा है और गौरी का कहना है कि यह भूमिका करते हुए वे महिलाओं की समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ पाईं। 'दशमी' एक साधारण लड़की लक्ष्मी की कहानी है और इस बात की भी कि उसे आखिर चंडिका क्यों बनना पड़ता है। इसी मौके पर गौरी ने 'मेरे भीतर की दुर्गा' में दिल खोलकर बातचीत की।

फिल्म में लक्ष्मी बनने और गानों में चंडिका का रौद्र रूप दिखाने के सफर के बारे में पूछे जाने पर गौरी ने कहा कि यह भूमिका करना बड़ी चुनौती थी। उनके मुताबिक लक्ष्मी हर घर में होती है, लेकिन वह चंडिका का रूप भी ले सकती है। नवरात्र में दुर्गादेवी के जो 9 रूप होते हैं, वे हर महिला में दिखते हैं। इस किरदार में उन्हें वह सब निभाने का मौका मिला, इसलिए वे खुद को भाग्यवान मानती हैं।

गौरी ने कहा कि आज समाज में जो घटनाएं हो रही हैं, वे बेहद तकलीफदेह हैं। घर में बेटी पैदा होती है तो हम कहते हैं कि लक्ष्मी आई है, लेकिन समाज में उसे दुर्गा का रूप लेना पड़ता है, क्योंकि उसके साथ वैसे हालात बनते रहते हैं। उन्होंने कहा, दुर्भाग्य से चंडिका बनना ही पड़ता है। लक्ष्मी से चंडिका तक के इस सफर में उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला।

दर्शकों की सबसे अच्छी दाद के बारे में पूछने पर गौरी हंस पड़ीं। उन्होंने कहा कि काम की तारीफ हो रही है तो बहुत अच्छा लग रहा है। अब तक उन्होंने काफी सौम्य भूमिकाएं की हैं और अब बिल्कुल अलग रोल करने पर हर तरफ से प्यार मिल रहा है। दो-तीन बार तारीफ करने के बाद कुछ लोगों ने मिलने पर कहा कि उनका नाम गौरी है, इसलिए वे अपनी बेटी का नाम भी गौरी रखना चाहेंगे। गौरी इसे अपने लिए सबसे बड़ी दाद मानती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि आजकल समाज में जो कुछ चल रहा है, उससे बहुत गुस्सा और संताप होता है। फिल्म देखकर उनके काम से एक भी लड़की को प्रेरणा मिले, वह और मजबूत बने और समाज पर उनके काम का असर पड़े, तो उन्हें और अच्छा लगेगा।

पर्दे पर हाथ में हथियार लेकर अन्याय के खिलाफ खड़े होने से खुद में कितना बदलाव आया, इस सवाल पर गौरी ने कहा कि पर्दे पर वे हथियार लेकर खड़ी होती हैं, पर एक अभिनेत्री के तौर पर उन्हें खुद बहुत ऊर्जा मिली। अभिनय करते समय खुद को समझना पड़ता है और इस फिल्म से उन्होंने वह समझा है। लक्ष्मी जो कुछ सहती है, उसे उतनी ही तीव्रता से पर्दे पर लाने के लिए उसे महसूस करना जरूरी था। निजी तौर पर उन्हें अपने भीतर काफी बदलाव महसूस हुआ। उनका कहना है कि महिलाओं का अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना बहुत जरूरी है और उन्हें भरोसा है कि फिल्म देखकर लड़कियों को हाथ में हथियार न होने पर भी वही ऊर्जा मिलेगी।

पहले की सहनशील स्त्री और आज की Gen-Z दौर की स्वाभिमानी लड़की में फर्क के बारे में गौरी ने कहा कि दोनों में काफी फर्क है, और यह अच्छा फर्क है। पहले महिलाएं एक चौखट में रहती थीं। अब लड़कियां बहुत मजबूत हो गई हैं, हर काम में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी होती हैं और अपना स्वाभिमान भी बचाकर रखती हैं, जो ज्यादा गर्व की बात है।

अपनी असल जिंदगी की 'पहली दुर्गा' के बारे में गौरी ने कहा कि हर किसी की जिंदगी में पहली दुर्गा और पहली देवी उसकी मां होती है, और उनकी मां भी उनकी दुर्गा हैं। साथ ही उन्हें लगता है कि वे हर महिला से मुसीबतों से लड़ना और मजबूत रहना सीख रही हैं।

आजकल लड़कियों पर होने वाले अत्याचारों को देखते हुए मानसिक और शारीरिक तौर पर सक्षम होना कितना जरूरी है, इस पर गौरी ने साफ कहा कि सुरक्षा बेहद अहम है। रात होने पर मन में एक डर रहता ही है और कितना भी इनकार करें, इसे अभी नकारा नहीं जा सकता। सुरक्षा के लिए हर किसी को कभी न कभी दुर्गा बनना ही पड़ता है। उनके मुताबिक सही फैसले लेते हुए आगे बढ़ना और दुर्गावतार धारण करना आज की दुनिया में बहुत जरूरी है।

गौरी ने मिसाल के तौर पर अपनी बहन शैला कुलकर्णी का नाम लिया, जो पहली महिला Action निर्देशक हैं और महाराष्ट्र पुलिस विभाग के साथ मिलकर महिलाओं की सुरक्षा के लिए ट्रेनिंग देती हैं। गौरी ने कहा कि उनसे उन्होंने काफी कुछ सुना और सीखा है, और ऐसी कई लड़कियां हैं जिन्हें वे मार्गदर्शन दे रही हैं। इस फिल्म के बहाने गौरी को जिंदगी भर के लिए दुर्गा का रूप समझ आ गया है, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं।

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