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बुज़ुर्गों के अधिकारों के लिए बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि की मांग तेज़

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकारों पर संधि का मसौदा बनाने के लिए कार्यसमूह गठित किया है।

बुज़ुर्गों के अधिकारों के लिए बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि की मांग तेज़ तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

दुनिया की आबादी तेज़ी से उम्रदराज़ हो रही है, लेकिन सवाल यह है कि अधिक उम्र के लोगों को इज़्ज़त, बराबरी, सुरक्षा और अच्छी सेहत के साथ जीने का हक़ सच में मिल रहा है या नहीं। गरीबी, सामाजिक बहिष्कार, स्वास्थ्य सेवाओं और इंसाफ़ तक पहुँचने में उन्हें क्यों जूझना पड़ता है? अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्थाओं में तरक्की के बावजूद बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक अलग, कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि की ज़रूरत बनी हुई है।

यह मांग नई नहीं है। 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा तैयार होने के दौरान ही अर्जेंटीना ने "बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकारों की घोषणा" का प्रस्ताव रखा था। अब लगभग आठ दशक बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने ऐसी संधि का मसौदा बनाने के लिए एक अंतर-सरकारी कार्यसमूह बनाया है। यह संधि उम्रवाद पूर्वाग्रह और भेदभाव जैसी गहरी जमी समस्याओं को संबोधित करेगी।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय में इस कार्यसमूह के सचिव खालिद हसीन ने कहा कि मौजूदा मानवाधिकार व्यवस्था में बढ़ती उम्र के लोगों की ज़रूरतों और अनुभवों को पूरी जगह नहीं मिलती। उम्र के आधार पर भेदभाव और उम्रवाद पूर्वाग्रहों से जुड़ी रूढ़ धारणाओं को अब भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने का अनुभव सिर्फ़ सालों की गिनती से तय नहीं होता, इसमें सामाजिक, आर्थिक और निजी हालात की भी बड़ी भूमिका होती है। सरकारी आँकड़ों और मानवाधिकार रिपोर्टों में जब बुज़ुर्गों की मौजूदगी कम होती है, तो नीतियों और सेवाओं में उनकी ज़रूरतें भी पीछे छूट जाती हैं।

हसीन ने ये बातें बढ़ती उम्र के लोगों के मानवाधिकारों पर अंतरसरकारी बैठक से पहले हुए शी एंड राइट्स सत्र में रखीं। इस सत्र का आयोजन ग्लोबल सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी एंड इन्क्लूज़न और सीएनएस ने कई अंतरराष्ट्रीय नागरिक समाज संगठनों के साथ मिलकर किया था।

शी एंड राइट्स की नेत्री और नारीवादी कार्यकर्ता शोभा शुक्ला ने कहा कि अधिक उम्र के लोगों को बाहर रखना हमेशा 'अनजाने' में नहीं होता। व्यवस्था की रुकावटें, पूर्वाग्रह और पितृसत्तात्मक सोच उन्हें नीतिगत चर्चाओं और संरक्षण के दायरे से दूर रख सकती हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (यूपीआर) के आँकड़े गिनाए। 2008 से अब तक 1,24,539 से ज़्यादा सिफारिशों में से सिर्फ़ 681 बढ़ती उम्र के लोगों से जुड़ी थीं, यानी महज़ 0.5 प्रतिशत।

जिनेवा के ग्लोबल सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी एंड इंक्लूज़न की डेटा मैनेजर रैचेल रिएल ने स्वास्थ्य एवं अधिकार वेधशाला का ज़िक्र किया। यह मुफ़्त, सार्वजनिक और संवादात्मक मंच है, जो यूपीआर की सिफारिशों को स्वास्थ्य संकेतकों से जोड़ता है। उनके मुताबिक स्वास्थ्य से जुड़ी करीब 29,000 सिफारिशों में से सिर्फ़ 144 खास तौर पर बढ़ती उम्र के लोगों की सेहत पर थीं। इनमें से लगभग 92 प्रतिशत को सरकारों का समर्थन मिला, फिर भी इस मुद्दे को ज़रूरी तवज्जो नहीं मिली।

ग्लोबल अलायंस फॉर द राइट्स ऑफ ओल्डर पीपल की सह-अध्यक्ष रोज़ गाहिरे के अनुसार बाध्यकारी संधि से सुरक्षा की कमियाँ दूर हो सकती हैं, सरकारों की ज़िम्मेदारी साफ़ हो सकती है और जवाबदेही तय हो सकती है। उन्होंने कहा, "उम्र बढ़ना सार्वभौमिक है, लेकिन गरिमा, सुरक्षा और सम्मान के साथ उम्रदराज़ होना अभी हर किसी की वास्तविकता नहीं है।" संधि में उम्रवाद पूर्वाग्रह और उस भेदभाव को भी शामिल किया जाना चाहिए, जो बुज़ुर्गों की आज़ादी, रोज़गार, नीतिगत फ़ैसलों में भागीदारी और संघर्षों व प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सुरक्षा पर बुरा असर डालता है।

सभी बुज़ुर्गों के अनुभव एक जैसे नहीं होते। लिंग, दिव्यांगता, गरीबी, जातीयता, प्रवासन और भौगोलिक स्थिति जैसे कारक उनके जीवन और अधिकारों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करते हैं। अफ्रीका में बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकारों पर कानूनी रूप से बाध्य क्षेत्रीय प्रोटोकॉल 2024 में लागू हुआ। रोज़ गाहिरे ने ज़ोर दिया कि वैश्विक संधि को ऐसी मौजूदा व्यवस्थाओं को मज़बूत करना चाहिए। मूल सिद्धांत साफ़ होना चाहिए कि बढ़ती उम्र के लोगों के बारे में कोई भी फ़ैसला उनकी भागीदारी के बिना न लिया जाए।

बढ़ती उम्र की महिलाओं को गरीबी, आर्थिक निर्भरता, संपत्ति पर गैर-बराबर हक़ और लैंगिक हिंसा का सामना करना पड़ सकता है। दिव्यांग बुज़ुर्गों को सुलभ सेवाएँ नहीं मिलतीं। एचआईवी के साथ जी रहे अधिक उम्र के लोग सामाजिक कलंक, बिखरी स्वास्थ्य सेवाओं और नाकाफ़ी सामाजिक सुरक्षा से जूझते हैं। ग्रामीण अलगाव, प्रवासन और जेंडर पहचान भी उनकी मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।

नारीवादी विशेषज्ञ डॉ पाम राजपूत ने नागरिक समाज से संधि बनाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की। उनके मुताबिक नई संधि को मौजूदा अंतरराष्ट्रीय मानकों से आगे जाना चाहिए और भेदभाव के आपस में जुड़े रूपों को साफ़ तौर पर मान्यता देनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बुज़ुर्ग सिर्फ़ देखभाल पाने वाले नहीं हैं। उनका ज्ञान, अनुभव और समाज में योगदान बेहद कीमती है, और उन्हें अपने अधिकारों का दावा करने और फ़ैसले की प्रक्रिया में हिस्सा लेने का पूरा मौक़ा मिलना चाहिए।

पिछले 42 साल से एचआईवी के साथ जी रहीं प्रिज्मा की सह-संस्थापक और निदेशक निकोलेटा पुलिसेक ने कहा कि एचआईवी के साथ उम्रदराज़ होना अधिकारों, संसाधनों और फ़ैसले की ताकत से जुड़ा मुद्दा है। ज़्यादा उम्र तक जीना चिकित्सा विज्ञान और सामुदायिक कोशिशों की कामयाबी है, लेकिन भेदभाव, गोपनीयता का उल्लंघन और सामाजिक सुरक्षा की कमी अब भी गंभीर समस्याएँ हैं। उन्होंने समुदाय की अगुवाई में जुटाए सबूतों के आधार पर नीतियाँ बनाने और सरकारों को जवाबदेह ठहराने की ज़रूरत बताई। निकोलेटा ने कहा, "अधिक समय तक जीवित रहने का अर्थ यह भी होना चाहिए कि हम अधिकारों, गरिमा और अपने जीवन को स्वयं दिशा देने की शक्ति के साथ जी सकें।"

ज़िम्बाब्वे और भारत के सामुदायिक प्रतिनिधियों तारिरो कुताद्ज़ा और दक्षा पटेल ने एचआईवी के साथ जी रहे बुज़ुर्गों की सेहत की चुनौतियों, सामाजिक कलंक और अकेलेपन की ओर ध्यान दिलाया। नेपाल की सीनियर सिटिज़न्स वेलफेयर एसोसिएशन की संस्थापक-अध्यक्ष ईश्वरी स्वर ने बताया कि नौजवानों के पलायन से दूरदराज़ के गाँवों में कई बुज़ुर्ग परिवार के सहारे और ज़रूरी सेवाओं से वंचित रह जाते हैं। इसके उलट इंडोनेशिया के स्वास्थ्य मंत्रालय के डॉ. इमरान पंबुडी ने एकीकृत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, मुफ़्त स्वास्थ्य जाँच और समुदाय-आधारित दीर्घकालिक देखभाल के उदाहरण रखे। उनके शब्दों में, "उम्रदराज़ होना मानव विकास की उपलब्धि है; हमारी ज़िम्मेदारी है कि हर व्यक्ति इसका अनुभव गरिमा, स्वास्थ्य और सार्थकता के साथ कर सके।"

रोज़ गाहिरे के शब्दों में, "उम्र बढ़ने के साथ मानवाधिकार कम नहीं होते। गरिमा की कोई समाप्ति तिथि नहीं होती।"

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