बिना किसी तकलीफ के भी ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच क्यों जरूरी, डॉक्टर ने बताई वजह
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर लिमिटेड (मुंबई) की लैब चीफ डॉ. मधुरा जोगवार ने विश्व स्ट्रोक दिवस के मौके पर बताया कि शुगर और कोलेस्ट्रॉल बिना लक्षण के भी सेहत पर असर डाल सकते हैं।
आपका खानपान ठीकठाक है, रोज के काम आराम से निपट जाते हैं और सेहत की कोई शिकायत भी नहीं है। फिर भी इसका मतलब यह नहीं कि फिक्र की कोई बात ही नहीं। मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर लिमिटेड (मुंबई) की लैब चीफ डॉ. मधुरा जोगवार ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है।
डॉ. जोगवार के मुताबिक ब्लड शुगर का बढ़ना और कोलेस्ट्रॉल का बिगड़ना कई साल तक कोई साफ लक्षण दिखाए बिना धीरे-धीरे सेहत पर असर डाल सकता है। जब तक लक्षण नजर आने लगते हैं, तब तक शरीर को कुछ नुकसान पहले ही हो चुका हो सकता है।
29 अक्टूबर को विश्व स्ट्रोक दिवस (World Stroke Day) मनाया जाता है। इसी मौके पर इन दोनों बातों, यानी बढ़ी हुई शुगर और बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल, के बारे में जागरूकता फैलाने की जरूरत बताई गई है। खुद को पूरी तरह तंदुरुस्त महसूस करने पर भी इन्हें काबू में रखना क्यों जरूरी है, यह समझना भी उतना ही अहम है।
ब्लड शुगर यानी खून में मौजूद ग्लूकोज शरीर को ऊर्जा देने वाला मुख्य स्रोत है। पैंक्रियास (Pancreas) में बनने वाला इन्सुलिन हार्मोन ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है। जब इन्सुलिन ठीक से काम न करे या शरीर में काफी इन्सुलिन न बने, तो खून में शुगर बढ़ जाती है और धीरे-धीरे डायबिटीज हो सकता है। डॉ. जोगवार के अनुसार यह सब धीरे-धीरे होता है। किसी की शुगर कई महीने या साल भर तक बढ़ी रह सकती है और फिर भी डायबिटीज के आम लक्षण महसूस नहीं होते। प्री-डायबिटीज में शुगर सामान्य से ज्यादा होती है, लेकिन डायबिटीज के स्तर तक नहीं पहुंची होती। सही जांच न हो तो यह हालत भी अक्सर पकड़ में नहीं आती।
कोलेस्ट्रॉल शरीर में पाया जाने वाला एक चर्बीदार पदार्थ है। कोशिकाएं बनाने और कुछ हार्मोन तैयार करने के लिए उसकी जरूरत होती है। लेकिन आम बोलचाल में जिसे खराब कोलेस्ट्रॉल कहते हैं, यानी LDL कोलेस्ट्रॉल, उसकी मात्रा ज्यादा हो जाए तो वह खून की नलियों की अंदरूनी दीवारों पर जमने लगता है। इससे प्लाक्स (Plaques) नाम की परतें बनती हैं, जो वक्त के साथ नलियों को तंग कर देती हैं और उनका लचीलापन भी घटा देती हैं।
डॉ. जोगवार ने बताया कि स्ट्रोक, यानी दिमाग का दौरा, दो तरह से आ सकता है। एक में दिमाग को खून पहुंचाने वाली नली ब्लॉक हो जाती है और ऑक्सीजन दिमाग तक नहीं पहुंचती। इसे इस्केमिक स्ट्रोक (Ischaemic Stroke) कहते हैं। दूसरे में दिमाग की कोई नली फट जाती है और दिमाग के अंदर या आसपास खून बहता है। इसे हैमरेजिक स्ट्रोक (Haemorrhagic Stroke) कहा जाता है।
उनके मुताबिक LDL कोलेस्ट्रॉल ज्यादा हो तो नलियों में प्लाक्स बनने में मदद मिलती है और इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है। डायबिटीज से नलियों को नुकसान पहुंचता है, यानी उनकी अंदरूनी परत पर असर पड़ता है और शरीर में सूजन (Inflammation) बढ़ती है। ऐसे में एथेरोस्क्लेरोसिस (Atherosclerosis) की प्रक्रिया तेज हो सकती है, जिसमें नलियों में चर्बी की परत धीरे-धीरे जमकर उन्हें तंग कर देती है। हाई ब्लड प्रेशर खून बहने वाले स्ट्रोक का एक बड़ा जोखिम है, और डायबिटीज से हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारी का खतरा भी बढ़ता है। शुगर और कोलेस्ट्रॉल के साथ हाई ब्लड प्रेशर, धूम्रपान, शारीरिक हलचल की कमी या बढ़ा हुआ वजन हो तो खतरा और बढ़ जाता है। अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (US Centers for Disease Control and Prevention) की जानकारी के हिसाब से डायबिटीज वाले लोगों को दिल की बीमारी या स्ट्रोक की संभावना दूसरों के मुकाबले करीब दुगुनी होती है।
जांच के बारे में डॉ. जोगवार ने बताया कि ब्लड ग्लूकोज टेस्ट से शुगर का मौजूदा स्तर पता चलता है, जबकि HbA1c टेस्ट से पिछले करीब दो से तीन महीनों की औसत शुगर का पता चलता है। लिपिड प्रोफाइल (Lipid Profile) में कुल कोलेस्ट्रॉल, LDL, HDL (जिसे अक्सर अच्छा कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है) और ट्राइग्लिसराइड्स की मात्रा सामने आती है। Apo A, Apo B और Lipoprotein(a) जैसी खास जांचें नियमित लिपिड प्रोफाइल से ज्यादा जानकारी देती हैं। उनके अनुसार ये डायबिटीज वाले लोगों, कम उम्र में दिल की बीमारी झेल चुके लोगों या परिवार में हार्ट अटैक अथवा स्ट्रोक का पक्का इतिहास रखने वालों के लिए काम की हो सकती हैं।
कौन सी जांच करानी है और कितने वक्त बाद दोहरानी है, इस पर उम्र, परिवार की मेडिकल हिस्ट्री, वजन और ब्लड प्रेशर देखकर डॉक्टर सलाह दे सकते हैं। डॉ. जोगवार के मुताबिक कोई रिपोर्ट असामान्य आए तो उसे मरीज की पूरी सेहत के साथ जोड़कर देखना जरूरी है, और इलाज के फैसले डॉक्टर की सलाह से ही लिए जाने चाहिए।
स्ट्रोक के लक्षणों के बारे में उन्होंने कहा कि अचानक चेहरा एक तरफ टेढ़ा होना, हाथ या पैर में कमजोरी या सुन्नपन, बोलने में दिक्कत, शरीर का संतुलन बिगड़ना या अचानक नजर में बदलाव, ये स्ट्रोक के मुख्य लक्षण हैं। इनमें से कोई भी लक्षण दिखे तो फौरन मेडिकल मदद लेने की बात उन्होंने कही। स्ट्रोक के इलाज में शुरुआती वक्त, यानी गोल्डन ऑवर, बहुत निर्णायक होता है, क्योंकि इलाज में हर एक मिनट की देरी से दिमाग की और कोशिकाएं खत्म हो सकती हैं। इसलिए स्ट्रोक के इलाज की सुविधा वाले अस्पताल में वक्त रहते पहुंचना मरीज की जिंदगी में बड़ा फर्क ला सकता है।
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