बायोप्सी से कैसे तय होता है ब्रेस्ट कैंसर का इलाज, लैब में सैंपल के साथ क्या होता है
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर लिमिटेड की डॉ. कुंजल लीला ने बताया कि बायोप्सी का छोटा सा सैंपल लैब में जांच के बाद इलाज की दिशा तय करता है।
ब्रेस्ट में गांठ महसूस हो या मैमोग्राम में कुछ अलग दिखे, तो महिलाओं का घबराना आम बात है। सबसे पहला सवाल यही आता है कि कहीं कैंसर तो नहीं। मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर लिमिटेड में सर्जिकल पैथॉलॉजी की हेड ऑफ डिपार्टमेंट और कंसल्टेंट डॉ. कुंजल लीला ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है। उनके मुताबिक डॉक्टर की जांच और इमेजिंग टेस्ट से कुछ अहम इशारे मिलते हैं, लेकिन इस सवाल का साफ जवाब अक्सर बायोप्सी से ही मिलता है।
डॉ. लीला के अनुसार मैमोग्राम में ब्रेस्ट के अंदर कोई शक वाली परछाईं या बदलाव नजर आ सकता है। वह क्या है, किस तरह का है और उसका इलाज क्या होना चाहिए, यह बायोप्सी से पता चलता है। उनका कहना है कि बायोप्सी के बिना सिर्फ अंदाजा लगाया जाता है।
GLOBOCAN 2024 के आंकड़ों के हवाले से डॉ. लीला ने बताया कि भारत में हर साल ब्रेस्ट कैंसर के करीब 2,37,231 नए मरीज सामने आते हैं। देश में कैंसर के कुल नए मरीजों में यह हिस्सा 15.2 प्रतिशत है। भारत में यह कैंसर आम तौर पर 40 से 50 साल की उम्र के बीच ज्यादा दिखता है, यानी पश्चिमी देशों से लगभग दस साल पहले। उनके मुताबिक डर की वजह से या नियमित जांच न कराने के कारण अब भी करीब आधी महिलाएं तीसरे या चौथे स्टेज में डॉक्टर के पास पहुंचती हैं।
जांच को लेकर डॉ. लीला ने बताया कि पीरियड शुरू होने के 7 से 10 दिन बाद हर महीने खुद ब्रेस्ट की जांच (सेल्फ एग्जामिनेशन) करनी चाहिए। 30 साल की उम्र के बाद हर साल डॉक्टर से जांच कराने और 40 के बाद मैमोग्राम की सलाह दी जाती है। उनके मुताबिक मैमोग्राम से गांठ महसूस होने से करीब दो साल पहले भी कैंसर के संकेत मिल सकते हैं। कम उम्र की महिलाओं और घने ऊतकों (डेंस ब्रेस्ट) वाली महिलाओं में अल्ट्रासाउंड काम आ सकता है, जबकि BRCA म्यूटेशन वाली या परिवार में ब्रेस्ट कैंसर का पक्का इतिहास रखने वाली महिलाओं को MRI की सलाह दी जा सकती है।
इमेजिंग रिपोर्ट में BIRADS 4 या 5 आए, यानी कैंसर का शक जताया जाए, तो बायोप्सी की सलाह दी जाती है। डॉ. लीला के अनुसार नई गांठ का लंबे समय तक बने रहना, निप्पल से खून मिला स्राव आना, ब्रेस्ट की त्वचा मोटी होना या अंदर खिंची हुई दिखना (डिंपलिंग) और बगल में शक वाली गांठें महसूस होना, इन हालात में भी बायोप्सी की जरूरत पड़ सकती है।
ज्यादातर मामलों में कोर नीडल बायोप्सी होती है। डॉ. लीला ने बताया कि इसमें लोकल एनेस्थीसिया दिया जाता है और अल्ट्रासाउंड की मदद से गांठ से ऊतक के 3 से 4 छोटे सैंपल लिए जाते हैं। प्रक्रिया करीब 15 मिनट में पूरी हो जाती है, टांके नहीं लगते और मरीज उसी दिन घर जा सकता है। कुछ खास हालात में वैक्यूम-असिस्टेड या सर्जिकल बायोप्सी भी करनी पड़ सकती है। उन्होंने साफ कहा कि बायोप्सी करने से कैंसर फैलता नहीं है।
सैंपल लेने के बाद उसे फौरन फॉर्मालिन में सुरक्षित रखकर लैब भेजा जाता है। यहां पैथॉलॉजिस्ट की भूमिका अहम होती है। टिश्यू पर प्रक्रिया के बाद हिस्टोपैथॉलॉजी जांच होती है, जिससे पता चलता है कि टिश्यू सामान्य है या नहीं, उसमें आगे कैंसर का खतरा बढ़ाने वाले बदलाव हैं या असली कैंसर सेल्स हैं। कैंसर हो तो उसका प्रकार और ग्रेड, यानी वह कितना आक्रामक हो सकता है, यह भी देखा जाता है। कई बार सटीक निदान के लिए इम्युनोहिस्टोकेमिस्ट्री (IHC) जैसे खास टेस्ट भी लगते हैं।
IHC के एक अहम समूह में ER, PgR, HER2neu और Ki-67 आते हैं। डॉ. लीला के मुताबिक ये टेस्ट बताते हैं कि कैंसर की बढ़त के पीछे कौन से कारक हैं और कैंसर सेल्स कितनी तेजी से बढ़ रही हैं। ब्रेस्ट कैंसर के 60 से 70 प्रतिशत मरीजों में ER/PgR पॉजिटिव होते हैं, जिन्हें हार्मोनल इलाज से फायदा हो सकता है और कुछ मामलों में कीमोथेरेपी टाली जा सकती है। 20 से 25 प्रतिशत मरीजों में HER2neu पॉजिटिव होता है, और उनका इलाज Trastuzumab नाम के खास टार्गेटेड इंजेक्शन से हो सकता है। Ki-67 सेल्स के बंटने की रफ्तार दिखाने वाला मार्कर है।
हर इन्वेसिव ब्रेस्ट कैंसर में ये टेस्ट जरूरी हैं, इसलिए उन्हें एक के बाद एक करने के बजाय शुरुआत में ही साथ कराने (रिफ्लेक्स टेस्टिंग) की सिफारिश की जाती है। इससे निदान का कीमती वक्त बचता है और इलाज जल्दी शुरू हो सकता है।
चुनिंदा मामलों में मॉलिक्यूलर या जीनोमिक टेस्ट भी होते हैं। HER2neu जीन टेस्ट से पिछले नतीजे साफ करने में मदद मिल सकती है। शुरुआती स्टेज में होने वाले जीन टेस्ट से कैंसर के दोबारा होने की संभावना बताने वाला स्कोर मिलता है। डॉ. लीला के अनुसार स्कोर कम हो तो कीमोथेरेपी टालकर सिर्फ गोलियों वाला इलाज सुरक्षित हो सकता है, और स्कोर ज्यादा हो तो कीमोथेरेपी से फायदा हो सकता है। इन टेस्ट की वजह से कई महिलाएं गैरजरूरी कीमोथेरेपी और उसके साइड इफेक्ट से बच पाई हैं। एडवांस्ड या ट्रिपल निगेटिव ब्रेस्ट कैंसर में BRCA1/2, PIK3CA और PD-L1 भी जांचे जाते हैं, ताकि तय हो सके कि PARP Inhibitors या इम्यूनोथेरेपी जैसा टार्गेटेड इलाज दिया जा सकता है या नहीं।
पैथॉलॉजी की फाइनल रिपोर्ट में माइक्रोस्कोप की जांच और बाकी खास टेस्ट के नतीजे एक साथ जुड़ते हैं। फिर डॉक्टरों की टीम इन रिपोर्ट, इमेजिंग जांच और मरीज की मेडिकल हालत को मिलाकर आगे के इलाज की योजना बनाती है। डॉ. लीला के शब्दों का सार यह है कि सिर्फ 15 मिनट में लिया गया एक छोटा सा सैंपल आने वाले कई सालों के इलाज की दिशा तय कर सकता है। ऑपरेशन करना है या नहीं, गोलियां, इंजेक्शन या कीमोथेरेपी, ऐसे फैसले इसी जांच की जानकारी पर टिके होते हैं। उनका कहना है कि बायोप्सी कुछ बुरा होने की निशानी नहीं, बल्कि बीमारी के बारे में साफ जानकारी की तरफ एक अहम कदम है।
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