मंगलवार, 3 नवंबर 2026

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घुग्घुस में लॉयड्स मेटल्स पर 7 करोड़ की जमीन और सार्वजनिक सड़क रोकने का आरोप

घुग्घुस में लॉयड्स मेटल्स पर 7 करोड़ की जमीन और सार्वजनिक सड़क रोकने का आरोप तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सेहत PT24 टीम

बीजेपी की दल नेता मीना चंद मोरपाका ने नगर परिषद के मुख्य अधिकारी को शिकायत दी है। कंपनी ने आरोपों को बेबुनियाद बताया है।

चंद्रपुर जिले के घुग्घुस में जमीन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड ने शांतिनगर के निवासियों की करीब 7 करोड़ रुपये की जमीन पर कब्जा किया और एक प्राइवेट अस्पताल बनाने के लिए सार्वजनिक सड़क बंद कर दी। जमीन के मालिकाना हक, लोगों के आने-जाने का रास्ता, नगर परिषद की मंजूरियां और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही, इन सब पर सवाल उठे हैं।

बीजेपी की गुट नेता मीना चंद मोरपाका ने घुग्घुस नगर परिषद के मुख्य अधिकारी को लिखित शिकायत दी है। उन्होंने कंपनी पर कानूनी कार्रवाई, सड़क को पहले जैसा करने और नगर परिषद प्रशासन की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग की है। आरोप तीस साल पुराने जमीन के एक समझौते और PMKKKY योजना के पैसे से बनी सड़क से जुड़े हैं।

मोरपाका के मुताबिक लॉयड्स मेटल्स और शांतिनगर के निवासियों के बीच 14 मई 1996 को समझौता हुआ था। इसके तहत कंपनी को 1.38 हेक्टेयर जमीन खरीदकर प्रोजेक्ट से प्रभावित परिवारों में बांटनी थी। कंपनी ने बाद में 62 प्लॉट के लेआउट की मंजूरी ले ली। मगर आरोप है कि करीब 2,600 वर्ग मीटर (27,975 वर्ग फुट) जमीन अलग निकालकर भविष्य के विकास के लिए आरक्षित कर दी गई। मोरपाका का कहना है कि शांतिनगर के लोगों के हित के लिए रखी गई यह जमीन अब प्राइवेट अस्पताल के विवादित प्रोजेक्ट का केंद्र बन गई है।

सबसे गंभीर आरोप उस सड़क को लेकर है जो चंद्रपुर रोड को शांतिनगर से जोड़ती है और बताया जाता है कि विवादित जमीन से गुजरती थी। शिकायत के मुताबिक तब की ग्राम पंचायत ने 2019 में प्रस्ताव पास करके इस सड़क के कंक्रीटीकरण को मंजूरी दी थी, और सड़क PMKKKY योजना के तहत बनी। मोरपाका का आरोप है कि कंपनी ने सड़क के आर-पार सुरक्षा दीवार खड़ी की, उसका एक हिस्सा तोड़ दिया और उसी विवादित जमीन पर प्राइवेट अस्पताल बना रही है।

शिकायत में नगर परिषद के 29 अप्रैल 2026 के प्रस्ताव क्रमांक 14 की वैधता और प्रक्रिया पर भी सवाल है, जो सड़क बंद करने के प्रस्ताव से जुड़ा है। मोरपाका का कहना है कि नियम के हिसाब से सड़क बंद करने से पहले नागरिकों से आपत्तियां मंगाने के लिए 30 दिन का समय देना जरूरी था, लेकिन प्रस्ताव बिना इस प्रक्रिया के पास कर दिया गया।

विवाद के बाद 30 अप्रैल 2026 को सार्वजनिक सूचना निकालकर आपत्तियां मंगाई गईं। बताया गया है कि अमित बोरकर और एक अन्य निवासी ने प्रस्तावित बंद के खिलाफ लिखित आपत्ति दी। इसके बाद नगर परिषद ने 29 जून 2026 को प्रस्ताव क्रमांक 19 पास किया। इसमें चुने हुए प्रतिनिधियों, शांतिनगर के निवासियों और कंपनी के अधिकारियों की बैठक रखने और फिर विशेष आम सभा में आखिरी फैसला लेने की बात है। मोरपाका के मुताबिक इस प्रक्रिया से अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि आपत्तियां दर्ज होने और अंतिम फैसला लंबित रहने के बावजूद विवादित जमीन और सड़क से जुड़ा निर्माण कैसे चलता रहा। मोरपाका ने जांच की मांग की है कि अस्पताल का काम जमीन के उपयोग के नियमों, नगर परिषद की अनुमति और सड़क बंद करने की तय प्रक्रिया के हिसाब से शुरू हुआ या नहीं। उन्होंने कांग्रेस की अगुवाई वाले नगर परिषद प्रशासन की भूमिका की निष्पक्ष जांच की भी मांग की है, क्योंकि उनके मुताबिक मामले को संभालने में प्रक्रिया की गड़बड़ियां हुईं।

अपनी शिकायत में मोरपाका ने तीन मांगें रखी हैं। पहली, कथित कब्जे की पूरी जांच हो और लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड पर उचित कानूनी कार्रवाई की जाए। दूसरी, शांतिनगर की सार्वजनिक सड़क तुरंत पहले जैसी की जाए और उसे तोड़ने व रोकने की जांच हो। तीसरी, भविष्य के विकास के लिए आरक्षित जमीन को उसकी मूल स्थिति में लौटाया जाए और अस्पताल के लिए उसके उपयोग की वैधता जांची जाए। इसके अलावा उन्होंने सड़क और जमीन पर लिए गए फैसलों को लेकर नगर परिषद प्रशासन की स्वतंत्र जांच भी मांगी है।

उधर कंपनी ने अपने प्रतिनिधि प्रशांत पुरी के जरिए इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पुरी ने आरोपों को बेबुनियाद और गलत बताया। उनका कहना है कि विवादित जमीन कंपनी की है और 7/12 के रिकॉर्ड देखने से मालिकाना हक साफ हो जाएगा। कंपनी का तर्क है कि सरकारी जमीन दस्तावेज जांचे बिना आरोप नहीं लगाने चाहिए और राजस्व रिकॉर्ड उसके मालिकाना दावे की पुष्टि करते हैं। कंपनी के इस जवाब में सार्वजनिक सड़क, 1996 के समझौते, जमीन के तय उपयोग और सड़क बंद करने की नगर परिषद की प्रक्रिया के सवालों का अलग से जवाब नहीं है। नगर परिषद का जवाब, लंबित आपत्तियों की स्थिति और चल रहे निर्माण की वैधता अब अहम मुद्दे बन गए हैं।

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