विश्वकर्मा कौन हैं, जिनसे जुड़ी हैं इंद्र के वज्र और शिव के त्रिशूल की कथाएं
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श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र, महादेव का त्रिशूल और इंद्र का वज्र किसने बनाया, इसकी पौराणिक कथाएं विश्वकर्मा तक ले जाती हैं।
देवी-देवताओं की तस्वीरों में आपने अक्सर दिव्य अस्त्र देखे होंगे। श्रीकृष्ण के हाथ में सुदर्शन चक्र, महादेव के हाथ में त्रिशूल और इंद्र के हाथ में वज्र इसके कुछ उदाहरण हैं। स्वर्गलोक, इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर जैसे नगरों की कहानियां भी हम सब ने सुनी हैं। सवाल यह है कि इन अस्त्रों को किसने बनाया और देवताओं के लिए भव्य राजमहल और नगर किसने खड़े किए। इन सवालों के जवाब भारतीय पौराणिक परंपरा के एक खास नाम तक पहुंचते हैं, और वह हैं देवताओं के दिव्य शिल्पकार और वास्तुविशारद विश्वकर्मा।
हिंदू पौराणिक परंपरा में विश्वकर्मा को देवताओं का आदि शिल्पकार, वास्तुविशारद और दिव्य चीजों का निर्माता माना जाता है। नाम के मुताबिक ही उन्हें विश्व का निर्माता कहा जाता है। देवताओं के लिए राजमहल, सभाएं, नगर, रथ और शस्त्र बनाने का काम उन्हीं से जोड़ा जाता है। ऋग्वेद में विश्वकर्मा नाम का जिक्र विश्व की रचना करने वाली दिव्य शक्ति के संदर्भ में मिलता है। आगे की पुराणकथाओं में उनका रूप देवताओं के कुशल कारीगर और वास्तुरचनाकार के तौर पर फैलता गया। इसी वजह से उन्हें सिर्फ शस्त्र बनाने वाला नहीं, बल्कि दिव्य स्थापत्यकला का प्रतीक भी माना जाता है।
इंद्र के वज्र की कथा भारतीय पौराणिक कथाओं की सबसे मशहूर कहानियों में गिनी जाती है। वृत्रासुर को हराने के लिए इंद्र को असाधारण ताकत वाले अस्त्र की जरूरत थी। भागवत पुराण और दूसरी पुराण परंपराओं में बताया जाता है कि दधीचि ऋषि ने देवताओं की भलाई के लिए अपने शरीर का त्याग कर दिया। उनकी अस्थियों से वज्र बनाया गया और उसी अस्त्र की मदद से इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया। इस कथा में दिव्य अस्त्र की रचना को विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है।
सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण से जुड़ा दिव्य अस्त्र है। इसे धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश का प्रतीक माना जाता है। कुछ पौराणिक कथाओं में सुदर्शन चक्र के निर्माण का संबंध विश्वकर्मा से जोड़ा गया है। कुछ परंपराओं में यह कथा भी कही जाती है कि सूर्य के तेज का एक हिस्सा कम करके उससे दिव्य अस्त्र गढ़े गए। इन वर्णनों में सुदर्शन चक्र के साथ विष्णु के दूसरे दिव्य आयुधों का भी जिक्र मिलता है।
भगवान शंकर के हाथ का त्रिशूल उनकी शक्ति और बुरी प्रवृत्तियों के नाश का प्रतीक है। कुछ पौराणिक परंपराओं के अनुसार त्रिशूल की रचना विश्वकर्मा ने की थी। इसकी तीन नोकों को सृष्टि, स्थिति और संहार, यानी विश्वचक्र के तीन कामों से जोड़ा जाता है। कुछ आध्यात्मिक अर्थों में त्रिशूल को भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल का प्रतीक भी माना गया है।
विश्वकर्मा का नाम सिर्फ अस्त्रों तक सीमित नहीं है। स्वर्ग में देवताओं के निवास, दिव्य राजमहलों और अलौकिक इमारतों की रचना से भी उन्हें जोड़ा जाता है। पुराणों में लिखा है कि देवी-देवताओं का निवास स्वर्गलोक, महाभारत का हस्तिनापुर नगर, हस्तिनापुर की कथाओं में बताए गए राजमहल, सभाएं और नगर रचना, और जादुई मायासभा, इन सबका निर्माण विश्वकर्मा ने किया।
एक बात अलग से गौर करने लायक है। इंद्रप्रस्थ की भव्य सभा का संबंध महाभारत की कथाओं में विश्वकर्मा के बजाय मयासुर से जोड़ा जाता है। मयासुर को असुरों के कुशल वास्तुशिल्पकार के रूप में जाना जाता है। यानी इंद्रप्रस्थ की सभा को बनाने वाले के तौर पर कथाएं मयासुर का नाम लेती हैं।
इन कथाओं को देखें तो विश्वकर्मा भारतीय पौराणिक कल्पनालोक में सृजनशीलता, कौशल और स्थापत्यकला के प्रतीक के रूप में सामने आते हैं। चाहे दिव्य अस्त्र हों या भव्य नगर, उनके निर्माण की कहानियों में प्राचीन भारतीय परंपरा की कल्पनाशक्ति, कुछ हद तक इतिहास और कारीगरी को दिए गए महत्व की झलक मिलती है।
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