गणेश चतुर्थी: गणपति की पूजा में क्यों नहीं चढ़ाई जाती तुलसी, जानिए इसकी पौराणिक कहानी
गणपति बाप्पा की पूजा में दूर्वा, लाल जास्वंद और कई फूल चढ़ाए जाते हैं, मगर तुलसी के पत्ते नहीं। इसके पीछे तुलसी देवी और गणपति से जुड़ी एक पुरानी पौराणिक कथा बताई जाती है।
गणेश चतुर्थी के मौके पर हर घर में बाप्पा की पूजा-अर्चना धूमधाम से हो रही है। पूजा में दूर्वा, लाल जास्वंद और तरह-तरह के फूल चढ़ाने की परंपरा है, लेकिन कई जगहों पर एक बात पर खास ध्यान दिया जाता है कि गणपति को तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाए जाते। आखिर ऐसा क्यों होता है, इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जो गणपति और तुलसी देवी से जुड़ी है।
कथा के मुताबिक, एक बार गणपति नदी किनारे बैठकर ध्यान लगा रहे थे। उसी समय तुलसी देवी वहां से गुजर रही थीं। गणपति का रूप और तेज देखकर वो उनकी तरफ आकर्षित हो गईं और उन्होंने गणपति के सामने विवाह की इच्छा जताई।
तुलसी देवी ने गणपति से शादी करने की बात कही, मगर गणपति ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वो ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं, इसलिए विवाह नहीं कर सकते। गणपति के इनकार से तुलसी देवी को बहुत बुरा लगा और गुस्से में आकर उन्होंने गणपति को शाप दे दिया कि उनकी शादी जरूर होगी।
तुलसी देवी के इस शाप से गणपति भी नाराज हो गए। कहा जाता है कि उन्होंने भी पलटवार करते हुए तुलसी देवी को शाप दिया कि उनका विवाह किसी असुर से होगा। बाद में तुलसी देवी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गणपति से माफी मांगी। गणपति ने उनकी विनती सुनकर उन्हें आशीर्वाद तो दे दिया, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि उनकी पूजा में तुलसी को कभी शामिल नहीं किया जाएगा। इसी पौराणिक कथा की वजह से माना जाता है कि गणपति की पूजा में तुलसी के पत्ते आमतौर पर नहीं चढ़ाए जाते।
हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि तुलसी का महत्व कम है। दूसरे देवी-देवताओं की पूजा में तुलसी को बेहद पवित्र और खास माना जाता है। हिंदू धर्म में तुलसी को पवित्र पौधा माना जाता है और खासकर भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा में तुलसीपत्र का बहुत महत्व है। यानी तुलसी की अहमियत कम नहीं है, बस गणपति की पूजा से जुड़ी परंपरा अलग मानी जाती है।
यह भी बताया जाता है कि यह नियम हर जगह एक जैसा नहीं है। कुछ धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में गणपति को तुलसी चढ़ाने का जिक्र भी मिलता है। इसका मतलब है कि 'गणपति को तुलसी कभी न चढ़ाएं' वाला नियम सभी परंपराओं में एक जैसा लागू नहीं होता। यह परिवार की परंपरा, संप्रदाय और स्थानीय पूजा-विधि के हिसाब से बदल सकता है।
गणपति की पूजा में आमतौर पर दूर्वा और लाल जास्वंद को खास महत्व दिया जाता है। इसके अलावा उपलब्धता के मुताबिक बाकी सुगंधित और सात्विक फूल भी भक्तिभाव से चढ़ाए जाते हैं। तुलसी न चढ़ाने के पीछे भले ही यह पौराणिक कथा बताई जाती हो, लेकिन यह धार्मिक मान्यता और परंपरा से जुड़ी बात है। हर परिवार या हर परंपरा में पूजा के नियम एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं। आखिर में श्रद्धा और भक्तिभाव को ही पूजा में सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है।