गणपति का एक दांत कैसे टूटा, परशुराम से युद्ध की पौराणिक कथा
कैलास पर परशुराम और गणेश के बीच हुए संघर्ष की कहानी, जिसमें गणेश को मिला 'एकदंत' नाम
गणपति के रूप का हर हिस्सा किसी न किसी गहरी बात से जुड़ा है। उनके बड़े कान हों, सूंड हो, बड़ा पेट हो या चूहे की सवारी, हर चीज के पीछे एक कहानी है। इसी तरह उनका 'एकदंत' रूप भी एक बहुत दिलचस्प पौराणिक घटना से जुड़ा है। यह कहानी भगवान परशुराम और गणपति के बीच हुए युद्ध की है।
बात तब की है जब भगवान परशुराम अपने आराध्य देव भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलास पर्वत पर पहुंचे थे। परशुराम शिव के बहुत बड़े भक्त माने जाते हैं और उस वक्त उनके हाथ में वही दिव्य फरसा था जो खुद भगवान शिव ने उन्हें दिया था। कैलास पहुंचकर परशुराम भगवान शिव और माता पार्वती से मिलने के लिए अंतःपुर में जाने लगे। लेकिन दरवाजे पर गणपति पहरा दे रहे थे। शिव और पार्वती उस समय आराम कर रहे थे, इसलिए गणपति ने परशुराम को अंदर जाने से रोक दिया।
परशुराम ने कहा कि वे शिव के भक्त हैं और उन्हें अंदर जाने दिया जाए, इस बात पर वे अड़ गए। लेकिन गणपति भी अपनी ड्यूटी से पीछे नहीं हटे और उन्होंने रास्ता नहीं दिया।
गणपति के इस तरह रोकने को परशुराम ने अपना अपमान समझ लिया। इससे उनके स्वभाव की तेजी और गुस्सा भड़क उठा। दूसरी ओर गणपति भी अपने मां-बाप की आज्ञा मानने से पीछे हटने वाले नहीं थे। इस वजह से दोनों के बीच बहस बढ़ती गई और आखिर में यह लड़ाई में बदल गई। दोनों ही बहुत ताकतवर थे। गणपति ने परशुराम का रास्ता रोक दिया, तो परशुराम ने अपना दिव्य हथियार उठा लिया। इसी लड़ाई में परशुराम ने भगवान शिव से मिला वही फरसा गणपति पर चलाया।
इस पूरी कहानी में सबसे खास बात यह है कि गणपति ने उस वार को वापस नहीं किया। इसकी वजह यह थी कि गणपति जानते थे कि यह हथियार खुद उनके पिता भगवान शिव ने परशुराम को दिया है। पिता के दिए हुए हथियार का अपमान न हो, उसकी इज्जत बनी रहे, इसी भावना से गणपति ने वह वार अपने दांत पर झेल लिया। फरसे की चोट से उनका एक दांत टूट गया। मान्यता है कि इसी वजह से गणपति को 'एकदंत' नाम मिला। इस कथा में सबसे बड़ी बात यह है कि इतनी ताकत होने के बावजूद गणपति ने परशुराम के हथियार की इज्जत रखी।
गणपति ने अपना दांत गंवाया, लेकिन उन्होंने धर्म, अपने कर्तव्य और पिता के हथियार का सम्मान नहीं छोड़ा। इसीलिए 'एकदंत' सिर्फ उनके शरीर के रूप का बयान नहीं, बल्कि त्याग, संयम और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक माना जाता है।