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लखनसिंह कटरे होंगे मूल में होने वाले झाडीबोली साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष

लखनसिंह कटरे होंगे मूल में होने वाले झाडीबोली साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

28 और 29 नवंबर 2026 को मूल में होने वाले झाडीबोली साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के तौर पर एड. लखनसिंह कटरे चुने गए हैं।

झाडीबोली साहित्य मंडल ने मूल में होने वाले झाडीबोली साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के तौर पर एड. लखनसिंह कटरे को चुना है। यह सम्मेलन 28 और 29 नवंबर 2026 को मूल में होगा। कटरे वरिष्ठ साहित्यकार और शोधकर्ता हैं और रिटायर्ड जिला निबंधक भी रहे हैं। उनके चुने जाने से झाडीबोली साहित्य आंदोलन से जुड़े साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों में खुशी का माहौल है। (गोंडपिपरी)

कटरे महाराष्ट्र शासन के सहकार, पणन और वस्त्रोद्योग विभाग में राजपत्रित अधिकारी थे। रिटायरमेंट के बाद वे अधिवक्ता के तौर पर काम कर रहे हैं। साहित्य, भाषा, इतिहास, लोकसंस्कृति और सामाजिक क्षेत्र में उनका अहम योगदान माना जाता है। उनकी पहचान कवि, कथाकार, निबंधकार, भाषा के अभ्यासक और शोधकर्ता की है। उन्होंने मराठी, हिंदी, झाडीबोली और पोवारी भाषाओं में खूब लिखा है और उनके 23 से ज्यादा ग्रंथ और किताबें छप चुकी हैं।

पोवारी और झाडीबोली बोलियों पर शोध करने, उन्हें बचाए रखने और उनका दस्तावेज़ तैयार करने के लिए कटरे लगातार काम करते रहे हैं। उनके उल्लेखनीय ग्रंथों में 'पोवारी साहित्य मंजूषा', 'पोवार समाज तथा पोवारी बोली : एक आकलन', 'एकोणिसावा अध्याय' और 'आडवळणावरील काही स्थानके' शामिल हैं। यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विद्यापीठ के लोकप्रशासन विषय के पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स के लिए उन्होंने दो पाठ्यपुस्तकें भी लिखी हैं।

कटरे भारत सरकार की साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की मराठी भाषा सलाहकार समिति के सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने अलग-अलग साहित्यिक संस्थाओं में अहम जिम्मेदारियां भी संभाली हैं। राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के शताब्दी महोत्सव के मौके पर विश्वविद्यालय से जुड़ी सौ उल्लेखनीय हस्तियों में उनका नाम शामिल किया गया था।

झाडीबोली साहित्य मंडल, चंद्रपुर के अध्यक्ष अरुण झगडकर ने कहा कि झाडीबोली सिर्फ बातचीत की बोली नहीं है, बल्कि झाडीपट्टी के लोकजीवन, सांस्कृतिक परंपरा और सामूहिक अस्मिता की वाहक है। उनके मुताबिक इस भाषा का साहित्यिक वैभव संभालना, बोली की विरासत नई पीढ़ी तक पहुंचाना और लोकसाहित्य का दस्तावेज़ तैयार करना, इन सब बातों को देखते हुए कटरे का चुना जाना खास अहमियत रखता है। झगडकर ने यह भी कहा कि कटरे के लंबे साहित्यिक और शोध के अनुभव का फायदा सम्मेलन को मिलेगा।

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