विकसनशील देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ा, विश्व बैंक की बैठक में नहीं निकला कोई हल
विकसनशील देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ा, विश्व बैंक की बैठक में नहीं निकला कोई हल
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दुनिया में कई जगह जंग और आंदोलन का माहौल है। ऐसे में विकसित देश हर तरह का संकट झेल सकते हैं, लेकिन विकसनशील और गरीब देशों के सामने कर्ज चुकाने का संकट दिन-ब-दिन गंभीर होता जा रहा है।
ब्याज दरें बढ़ रही हैं, महंगाई है, जंग जैसे हालात हैं और विदेशी आर्थिक मदद घट गई है। इन सब वजहों से इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भारी दबाव पड़ा है। शांति का माहौल बनने के उम्मीद भरे संकेत भी कम ही दिख रहे हैं। इसी बीच कर्ज की किस्त और ब्याज भरने में ही सरकारी आमदनी का बड़ा हिस्सा चला जा रहा है, इसलिए विकास के कामों के लिए पैसा बचना मुश्किल हो गया है।
विकसनशील देशों को जो सरकारी राजस्व मिलता है, उसका बड़ा हिस्सा कर्ज के ब्याज और वापसी में खर्च करना पड़ रहा है। नतीजा यह है कि सेहत, पढ़ाई, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के लिए उपलब्ध रकम कम पड़ रही है। कई देशों को पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ रहा है। लगभग हर तरफ अनिश्चितता फैली है और बाजार में पैसा बाहर नहीं निकल रहा।
इन देशों का कुल बाहरी कर्ज काफी बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार से लिए गए कर्ज पर ब्याज दर बढ़ने से हालत और मुश्किल हो गई है। ऊपर से विदेशी आर्थिक मदद और निवेश का बहाव घटने से विकास के लिए फंड जुटाना इन देशों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। अस्थिरता के माहौल में लोगों की अपने पास का पैसा खर्च करने की इच्छा भी घटती जा रही है।
मध्यपूर्व के संघर्ष और रूस-यूक्रेन जंग की वजह से दुनिया के बाजार में ईंधन, अनाज और ढुलाई का खर्च बढ़ने का डर है। आयात पर निर्भर गरीब देशों को इसकी बड़ी मार पड़ रही है। करेंसी की कीमत गिरने, बढ़ती महंगाई और विदेशी मुद्रा की कमी से आर्थिक संकट और गहरा हो रहा है।
इन हालात में कर्ज के पुनर्गठन, आर्थिक मदद और निजी निवेश बढ़ाने की मांग जोर पकड़ रही है। दूसरी तरफ, जंग के लिए हर तरह का सामान और हथियार देने वाले जो देश इसमें आगे हैं, उनका कारोबार तेजी में चल रहा है। हथियार और गोला-बारूद की बिक्री से कुछ गिने-चुने देश अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं।