सोम‌वार, 19 अक्टूबर 2026

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06:11 IST

हुथी हमलों से परेशान सऊदी की मदद को आगे आया मिस्र

मिस्र की राष्ट्रीय रक्षा परिषद ने सऊदी अरेबिया को सुरक्षा और शांति के लिए हर मुमकिन मदद देने की बात कही है।

हुथी हमलों से परेशान सऊदी की मदद को आगे आया मिस्र तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

मध्यपूर्व का संघर्ष और बढ़ गया है। हुथियों के इसमें कूदने के बाद से तनाव और तीखा हो गया है। स्रोत के मुताबिक इसके लिए सऊदी अरब की सरकार, यानी मोहम्मद बिन सलमान जिम्मेदार हैं।

बताया गया है कि ईरान में खमेनेई के अंतिम संस्कार में हुथियों के कुछ प्रमुख लोग गए थे। इसके बाद यमन की राजधानी सना में हुथियों के प्रमुख जब एयरपोर्ट पर उतर रहे थे, तब सऊदी समर्थक लोगों ने उन पर हमला कर दिया। इस हमले की वजह से विमान सना में नहीं उतरा और दूसरी जगह उतारा गया। तभी से हुथियों ने सऊदी पर हमले शुरू कर दिए।

अपने प्रमुखों को मारने की साजिश से हुथी भड़क गए और उन्होंने सऊदी की नाकेबंदी शुरू कर दी। सऊदी समर्थक यमन सरकार और अमेरिका साथ होने के बावजूद हुथियों का कोई बंदोबस्त नहीं हुआ। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव के कारण वह अभी हुथियों पर हमला नहीं कर सकता, इसलिए शुरुआत में पाकिस्तान को आगे किया गया।

पाकिस्तान मुश्किल में पड़ गया। मक्का पैक्ट तो हो गया, लेकिन हुथियों से सीधी लड़ाई अब मुमकिन नहीं है। वजह यह कि हुथी शिया समुदाय के मुसलमान हैं और पाकिस्तान में शियों की आबादी करीब 35 प्रतिशत है, इसलिए घर की जनता का विरोध झेलना मुश्किल होगा। इस बीच इस्राइल का नाम भी आया कि वह सऊदी की मदद को तैयार है। मगर सऊदी ने इस्राइल की मदद ली तो सारे मुस्लिम देशों की तरफ से उस पर नाराजगी निकलेगी और शर्मिंदगी होगी, इसलिए इस्राइल की मदद लेना सऊदी के लिए कभी ठीक नहीं है। अब इस खेल में मिस्र ने कदम रखा है।

मिस्र की राष्ट्रीय रक्षा परिषद ने सऊदी अरेबिया को सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए हर मुमकिन मदद देने का रुख रखा है। साफ किया गया है कि सऊदी की संप्रभुता, भौगोलिक अखंडता और अहम ठिकानों की हिफाजत के लिए मिस्र सहयोग करेगा। लेकिन असल फौजी मदद का फैसला तभी होगा, जब सऊदी की तरफ से गुजारिश आए और संसद की जरूरी मंजूरी मिल जाए। इसलिए मिस्र कौन-सा खिलाड़ी बनेगा, यह अभी साफ नहीं है।

यमन के हुथी बागियों ने हाल के दिनों में सऊदी अरेबिया के रियाद एयरपोर्ट और सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको की सुविधाओं पर हमले किए। इससे दुनिया को अंदाजा हुआ कि हुथियों की ताकत कितनी बढ़ गई है। सऊदी समर्थित यमन सरकार की फौज से फिर लड़ाई शुरू होने के बाद हालात और बिगड़े हैं। इन हमलों से सऊदी की सुरक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

मिस्र के राष्ट्रपति अल-सिसी ने संभावित फौजी मदद के लिए संसद की विशेष बैठक बुलाने की मांग की है। उन्होंने साफ किया कि सऊदी की हिफाजत के लिए मिस्र तैयार है, पर किसी पर हमला करने का उसका इरादा नहीं है। मिस्र और सऊदी अरेबिया के बीच पहले से मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं। 2015 में भी मिस्र यमन में सऊदी की अगुवाई वाले फौजी गठबंधन में शामिल हुआ था, मगर तब उसकी लड़ाकू भूमिका सीमित थी, ऐसा समझा जाता है। आगे क्या होगा, यह देखना अहम होगा।

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