रविवार, 11 अक्टूबर 2026

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21:15 IST

जंग, महंगाई और कर्ज की तिहरी मार, विकासशील देशों पर गहराया आर्थिक संकट

मध्य पूर्व की जंग, ईंधन और अनाज की महंगाई और कर्ज के बोझ से विकासशील देश मुश्किल में हैं। बैंकॉक में IMF और विश्व बैंक की बैठक पर दुनिया की नजर है।

जंग, महंगाई और कर्ज की तिहरी मार, विकासशील देशों पर गहराया आर्थिक संकट तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

दुनिया की अर्थव्यवस्था इस वक्त बड़े संकट के मुहाने पर खड़ी है। मध्य पूर्व की जंग, चढ़ते ईंधन के दाम, अनाज की महंगाई और सरकारी कर्ज का बढ़ता बोझ, इन सबने विकासशील देशों की हालत और खराब कर दी है। कोरोना के बाद कई देश संभलने की कोशिश में ही थे कि जंग ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा की सप्लाई पर फिर असर डाल दिया।

ऊपर से ब्याज दरें बढ़ने से कई देशों के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो गया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की आने वाली बैठक में इस संकट पर चर्चा होगी। पूरी दुनिया की नजर इस पर है कि विकासशील देशों की मदद के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

मध्य पूर्व में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष का असर अब सिर्फ जंग के मैदान तक सीमित नहीं रहा। दुनिया में तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई पर इसका गंभीर असर पड़ रहा है। खासकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाली आवाजाही में रुकावटें आने से दुनिया की तेल सप्लाई को बड़ा झटका लगा है। इस रास्ते से होने वाली तेल की सप्लाई बिगड़ी, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन के दाम चढ़ गए।

कच्चे तेल का भाव 100 डॉलर के आसपास पहुंचने से कई देशों में पेट्रोल, डीजल और बिजली महंगी होने का खतरा खड़ा हो गया है। ईंधन महंगा होने का असर ट्रांसपोर्ट, उत्पादन और खेती पर भी पड़ रहा है। खाद के दाम बढ़ने से खेती की लागत बढ़ने की आशंका है। नतीजतन अनाज के भाव चढ़ रहे हैं और आम लोगों के घर के बजट पर अलग से बोझ पड़ रहा है।

जंग और महंगाई के बीच विकासशील देशों के सामने कर्ज का सवाल और गंभीर हो गया है। कई देशों ने कोरोना के बाद अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए बड़े पैमाने पर कर्ज लिया था। अब ब्याज दरें बढ़ने से उसे चुकाना मुश्किल होता जा रहा है। विश्व बैंक के अंदाजे के मुताबिक विकासशील देशों पर 2026 में बाहरी कर्ज के तौर पर करीब 400 अरब डॉलर की देनदारी है।

इसका बड़ा हिस्सा सिर्फ ब्याज भरने में चला जाएगा। इससे शिक्षा, सेहत, इन्फ्रास्ट्रक्चर और रोजगार के लिए मिलने वाला फंड घटने की आशंका है। कुछ देशों के पास सरकारी खर्च में कटौती के सिवा कोई रास्ता नहीं बचेगा, और इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ सकता है। खासकर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के आर्थिक रूप से कमजोर देशों के लिए ये हालात चिंता की बात हैं।

इस पृष्ठभूमि में बैंकॉक में होने वाली IMF और विश्व बैंक की सालाना बैठक का महत्व बढ़ गया है। बढ़ती महंगाई, ऊर्जा संकट और कर्ज के बोझ का हल निकालना इस बैठक के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा ने बताया है कि ऊर्जा और महंगाई के झटकों से जूझ रहे 30 से 40 देशों से आर्थिक मदद को लेकर बातचीत चल रही है।

जरूरत पड़ी तो संकट में फंसे देशों के लिए मौजूद आर्थिक मदद बढ़ाने की तैयारी भी विश्व बैंक ने दिखाई है। इस बीच IMF के अंदाजे के मुताबिक 2026 में वैश्विक आर्थिक विकास दर तीन फीसदी के आसपास रह सकती है, लेकिन जंग लंबी खिंची तो यह अंदाजा बदल सकता है। विकासशील देशों को आर्थिक मदद, कर्ज के पुनर्गठन और महंगाई पर काबू के लिए ठोस फैसलों की जरूरत है। वरना जंग की आर्थिक मार दुनिया को और लंबे वक्त तक झेलनी पड़ सकती है।

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