विदर्भ-मराठवाड़ा में भुलाबाई के गीत, कोजागिरी पूर्णिमा तक चलता है उत्सव
भुलाबाई उत्सव नवरात्रि या दशहरे से शुरू होकर कोजागिरी पूर्णिमा को खत्म होता है। गीतों, प्रसाद के खेल और अनाज की सजावट से जुड़ा यह लोकउत्सव मुख्य रूप से विदर्भ, मराठवाड़ा और खानदेश के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है।
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महाराष्ट्र की लोकसंस्कृति कई त्योहारों, लोकगीतों और परंपराओं से समृद्ध है। इन्हीं में एक खास लोकउत्सव है भुलाबाई उत्सव, जो मुख्य रूप से विदर्भ, मराठवाड़ा और खानदेश के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। इसमें धार्मिक श्रद्धा, प्रकृति पूजन, सामूहिक आनंद और संस्कार, सब एक साथ दिखते हैं। आज की जीवनशैली में जब कई लोकपरंपराएं खत्म हो रही हैं, तब भुलाबाई उत्सव को संभालकर रखना और भी जरूरी हो जाता है।
उत्सव की शुरुआत आम तौर पर नवरात्रि उत्सव के दौरान या दशहरे से होती है। कोजागिरी पूर्णिमा के दिन इसका समापन होता है। भुलाबाई को माता पार्वती का और भुलोजी को भगवान शंकर का प्रतीक माना जाता है। लोकपरंपरा के मुताबिक पार्वती माता मायके आती हैं, ऐसी श्रद्धा है। इसी वजह से इस उत्सव में मायके का अपनापन और परिवार की आत्मीयता झलकती है।
भुलाबाई का आना मानो घर में बेटी के मायके आने जैसा है। उनके स्वागत के लिए की जाने वाली सजावट, पूजा और सामूहिक गीतों में प्रेम, श्रद्धा और आनंद जाहिर होता है।
बारिश के बाद खेतों में हरियाली छा जाती है और फसलों के बढ़ने के साथ नए अनाज के आने की आहट मिलने लगती है। इसी समय मनाया जाने वाला यह उत्सव खेती पर टिके जीवन से जुड़ा है। कुछ जगहों पर भुलाबाई और भुलोजी की मूर्तियों के सामने ज्वार के भुट्टे और तरह-तरह के अनाज की सजावट की जाती है। इस सजावट को प्रकृति की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
मिट्टी, बारिश, धूप, बीज और किसानों की मेहनत से अन्न पैदा होता है। इन सबके प्रति कृतज्ञता जताने का लोकपरंपरा का सहज तरीका भुलाबाई उत्सव है।
इस उत्सव की सबसे बड़ी खासियत पारंपरिक लोकगीत हैं। शाम को लड़कियां और महिलाएं इकट्ठा होकर भुलाबाई के गीत गाती हैं, घेरा बनाकर घूमती हैं और तरह-तरह के खेल खेलती हैं। इन गीतों में मायका-ससुराल, परिवार के रिश्ते, रोजमर्रा की घटनाएं, हास्य और महिलाओं के मन की दुनिया दिखाई देती है।
प्रसाद का खेल भी खास लोकप्रिय है। कोई लड़की खाने की चीज लेकर आती है और बाकी लड़कियों को बूझना होता है कि वह क्या है। इस खेल से उत्सुकता, सूझबूझ और खुशी पैदा होती है। प्रसाद को मिल-बांटकर खाने की परंपरा से सामूहिकता की भावना मजबूत होती है।
कोजागिरी पूर्णिमा के दिन भुलाबाई उत्सव का समापन होता है। इस दिन पूजा, नैवेद्य और प्रसाद का वितरण किया जाता है। कुछ जगहों पर रबड़ी का नैवेद्य दिखाने की, तो कुछ इलाकों में 32 तरह के पकवान बनाने की परंपरा है। भुलाबाई को विदा करते समय रास्ते का खाना देने की प्रथा भी मिलती है। इस परंपरा में प्रेम, मेहमाननवाजी और मायके का अपनापन झलकता है।
भुलाबाई उत्सव सिर्फ धार्मिक विधि नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की लोकसंस्कृति की जीती-जागती विरासत है। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, लोकगीतों की मिठास, दोस्ती, अपनापन और सामूहिक आनंद का सुंदर मेल इस उत्सव में देखने को मिलता है। अगर अगली पीढ़ी ये गीत गाए, पारंपरिक खेल खेले और उत्सव के पीछे के सांस्कृतिक मूल्यों को समझे, तो इस लोकपरंपरा को जरूर नई जान मिलेगी।