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03:57 IST

सुनने की ताकत गई, पर प्रेरणा सहाणे-दीक्षित ने भरतनाट्यम से बनाई अपनी पहचान

छह महीने की उम्र में लकवे के झटके से सुनने की क्षमता गंवाने वाली भरतनाट्यम नृत्यांगना प्रेरणा सहाणे-दीक्षित अब कर्णबधिर लड़कियों को नृत्य सिखाएंगी।

सुनने की ताकत गई, पर प्रेरणा सहाणे-दीक्षित ने भरतनाट्यम से बनाई अपनी पहचान तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

कुछ सपनों को आवाज़ की जरूरत नहीं होती, उन्हें बस जिद का साथ चाहिए। प्रेरणा केशव सहाणे-दीक्षित की कहानी यही कहती है। उन्हें संगीत सुनाई नहीं देता और ताल के सुर कानों तक नहीं पहुंचते, फिर भी वे पैरों से लय और हावभाव से भावनाओं के रंग उकेरकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। प्रेरणा भरतनाट्यम नृत्यांगना हैं। सिर्फ छह महीने की उम्र में उन्हें लकवे का तेज झटका आया था, जिससे उनकी सुनने की क्षमता पर गंभीर असर पड़ा।

लेकिन प्रेरणा ने इस चुनौती को अपनी हद नहीं माना। उन्होंने नृत्य के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई। भारत सरकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित प्रेरणा अब कर्णबधिर लड़कियों के लिए खास नृत्य क्लास शुरू करने जा रही हैं। अपने संघर्ष से दूसरों के सपनों को ताकत देने वाली यह नवदुर्गा कई लोगों के लिए प्रेरणा बन रही हैं।

जब प्रेरणा सात साल की थीं, तब उनके माता-पिता की मुलाकात पुणे के साधना नृत्यालय की गुरु शुमिता महाजन से हुई। जो बच्ची संगीत सुन नहीं सकती थी, उसे भरतनाट्यम सिखाने की चुनौती उन्होंने स्वीकार की। पिता केशव सहाणे पूरे 16 साल तक उन्हें नियमित रूप से नृत्य क्लास ले जाते रहे। गुरु के मार्गदर्शन, परिवार के साथ और लगातार रियाज के दम पर प्रेरणा ने भरतनाट्यम की तीन परीक्षाएं पास कीं।

2 जून 2007 को पुणे के टिळक स्मारक मंदिर में उन्होंने ढाई घंटे का 'अरंगेत्रम्' पेश किया। करीब एक हजार दर्शकों के सामने हुई इस एकल प्रस्तुति से उन्होंने अपनी कला की ताकत साबित की। इसके बाद केदारनाथ मंदिर के प्रांगण समेत देश के कई शहरों में उन्होंने नृत्य पेश किया। संत कान्होपात्रा के जीवन पर आधारित दो घंटे की एकल नृत्यनाटिका भी उन्होंने प्रस्तुत की।

प्रेरणा को 2015 में भारत सरकार का 'राष्ट्रीय पुरस्कार - रोल मॉडल' मिला। 'रुक्मिणी पुरस्कार' और 'संघर्ष सन्मान पुरस्कार' समेत उन्हें 35 से ज्यादा पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। जून 2025 में हंगरी में हुए अंतरराष्ट्रीय नृत्य महोत्सव में उनके समूह ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2026 में वे श्रीलंका के नृत्य महोत्सव में भी शामिल हुईं। उनकी जीवन यात्रा पर आधारित आत्मकथा 'प्रेरणा - द साउंड ऑफ सायलेन्स' को महाराष्ट्र शासन का 2016 का लक्ष्मीबाई टिळक आत्मचरित्र पुरस्कार मिला।

अब तक 75 से ज्यादा कार्यक्रम पेश कर चुकीं प्रेरणा विजयादशमी से कर्णबधिर लड़कियों के लिए भरतनाट्यम की खास क्लास शुरू करेंगी। उनकी कोशिश के पीछे मकसद यह है कि सुनने की क्षमता की कमी के कारण किसी भी लड़की को कला से दूर न रहना पड़े। अपने संघर्ष को दूसरों के लिए मौके में बदलने वाली प्रेरणा सिर्फ एक कामयाब नृत्यांगना नहीं हैं, वे कई लड़कियों के सपनों को नई दिशा देने वाली सचमुच की 'प्रेरणा' हैं।

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