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20:32 IST

शारदीय नवरात्र: अष्टमी 18 और नवमी 19 अक्टूबर को, जानिए कन्या पूजन का सही समय

अष्टमी और नवमी, दोनों दिन कन्या पूजन के मुहूर्त तय हैं। कुलाचार के हिसाब से 18 या 19 अक्टूबर 2026 को पूजा की जा सकती है।

शारदीय नवरात्र: अष्टमी 18 और नवमी 19 अक्टूबर को, जानिए कन्या पूजन का सही समय तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

शारदीय नवरात्र में कन्या पूजन को बहुत पुण्य का काम माना जाता है। इस साल सवाल यही है कि पूजन 18 अक्टूबर को किया जाए या 19 अक्टूबर को। यहां दोनों दिनों की तारीख, मुहूर्त और पूजा का तरीका एक साथ दिया जा रहा है।

दो से दस साल की बच्चियों को माता दुर्गा का साक्षात रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख और समृद्धि रहती है और माँ भवानी की कृपा साल भर बनी रहती है। पूजन के दौरान छोटी बच्चियों को जगदंबा का रूप मानकर उनकी सेवा की जाती है।

इस विधि में नौ छोटी बच्चियों को बुलाया जाता है, जो देवी के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। नौ दिन के उपवास और भक्ति का समापन इसी कन्या पूजन से होता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार नवरात्र के आखिरी दो दिन, यानी अष्टमी और नवमी, बेहद पवित्र माने जाते हैं। महाष्टमी (दुर्गाष्टमी) 18 अक्टूबर 2026, रविवार को है। महानवमी, जिस दिन सिद्धिदात्री पूजा होती है, 19 अक्टूबर 2026, सोमवार को है।

जिन परिवारों में कुलाचार के मुताबिक अष्टमी को पूजा होती है, वे 18 अक्टूबर को कन्या पूजन कर सकते हैं। वहीं जो भक्त नवमी को उपवास का पारण यानी समापन करते हैं, वे 19 अक्टूबर 2026 को पूजा करेंगे।

महाष्टमी यानी रविवार, 18 अक्टूबर 2026 को सुबह का शुभ मुहूर्त सुबह 7:45 से सुबह 9:10 बजे तक है। अभिजित मुहूर्त दोपहर 11:42 से दोपहर 12:48 बजे तक रहेगा।

महानवमी यानी सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को सुबह का शुभ मुहूर्त सुबह 9:12 से सुबह 10:40 बजे तक है। अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:05 से दोपहर 01:35 बजे तक रहेगा।

शास्त्रों के मुताबिक 2 से 10 साल की बच्चियों को देवी का साक्षात स्वरूप मानकर पूजा जाता है। इसके साथ एक छोटे लड़के को भी भैरवनाथ या लांगुरा के रूप में बुलाकर पूजने की परंपरा है।

पूजा की आसान विधि इस तरह है। सबसे पहले बच्चियों का आदर के साथ घर में स्वागत किया जाए। फिर साफ पानी या दूध से उनके पैर धोकर उन्हें आसन पर बिठाया जाए।

इसके बाद माथे पर कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाया जाए और हाथ पर लाल मौली यानी कलावा बांधा जाए। देवी के प्रसाद के रूप में पुरी, चना और सूजी का हलवा प्यार से परोसा जाए।

भोजन के बाद उन्हें लाल चुनरी ओढ़ाई जाए और अपनी क्षमता के मुताबिक फल, चीजें और दक्षिणा दी जाए। आखिर में सभी बच्चियों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाए। एक जरूरी बात यह है कि राहुकाल के समय कन्या पूजन करने से बचना चाहिए।

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