उमरेड कर्हांडला से पेंच तक 150 किलोमीटर चला साढ़े तीन साल का बाघ, बस्ती में नहीं घुसा
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
नागपुर जिले के दक्षिण-पूर्वी छोर से उत्तरी सीमा तक पहुंचे नर बाघ ने दोनों जंगलों के बीच अच्छे कॉरिडोर का पहला सबूत दिया है।
नागपुर जिले का एक साढ़े तीन साल का नर बाघ करीब 150 किलोमीटर का सफर तय करके चर्चा में आ गया है। वह उमरेड कऱ्हांडला अभयारण्य से निकलकर पेंच टाइगर रिजर्व तक पहुंच गया है। वन्यजीव प्रेमियों की नजर अब इसी बाघ पर टिकी है।
आम तौर पर बाघ बड़े होने पर मां से अलग हो जाते हैं और अपना इलाका बनाने के लिए जहां पैदा हुए, वहां से दूर तक निकल पड़ते हैं। यह बाघ भी अपने लिए नया ठिकाना खोजते हुए चला। वह उमरेड कऱ्हांडला अभयारण्य के 'गोठणगाव' जंगल में पैदा हुआ था। यह अभयारण्य नागपुर और भंडारा की सीमा पर बसा है। वह F2 बाघिन के पांच बछड़ों में से था और सबसे आखिर तक मां के साथ रहा।
अब उसने पेंच टाइगर रिजर्व में 'चोरबाहुली' के पास डेरा डाला है। यह जगह उसके जन्म वाले जंगल से 150 किलोमीटर दूर है। भौगोलिक तौर पर देखें तो वह नागपुर जिले के दक्षिण-पूर्वी छोर से चलकर जिले की उस उत्तरी सीमा तक पहुंचा, जो मध्य प्रदेश से लगी है।
इस पूरे रास्ते में उसने कहीं बस्ती में घुसपैठ की हो या मवेशियों को नुकसान पहुंचाया हो, ऐसी कोई खबर अब तक नहीं है। इससे एक बार फिर साफ हुआ कि बाघ अपना इलाका ढूंढने के लिए सैकड़ों किलोमीटर तक चल सकते हैं।
इस सफर से यह भी कहा जा रहा है कि उमरेड कऱ्हांडला और पेंच, इन दोनों वन क्षेत्रों को जोड़ने वाला अच्छा वन्यजीव कॉरिडोर बन रहा है। बाघ के चलने का यह रास्ता इसी बात का संकेत माना जा रहा है। नागपुर जिले में बाघ बेखौफ घूमते ही नहीं हैं, बल्कि एक जंगल से दूसरे जंगल तक बाघों के लिए अच्छा कॉरिडोर बनने का यह पहला सबूत भी है।
वन विभाग की टीम 29 अक्टूबर से, जब यह बाघ चोरबाहुली के पास दिखा, लगातार उस पर नजर रखे हुए है। वह पेंच में ही अपना इलाका बनाएगा या आगे मध्य प्रदेश की तरफ निकल जाएगा, यह अगले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा।
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