सोम‌वार, 2 नवंबर 2026

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आदिवासी समाज से अपील: जनगणना में धर्म के कॉलम में 'आदिवासी' लिखवाएं

आदिवासी समाज से अपील: जनगणना में धर्म के कॉलम में 'आदिवासी' लिखवाएं तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
समाज PT24 टीम

पोंभुर्णा में हुई छठी आदिवासी धर्मचिंतन परिषद में पूर्व विधायक डॉ. नामदेव उसेंडी ने समाज से आगामी जनगणना में धर्म के कॉलम में 'आदिवासी' दर्ज कराने को कहा।

आने वाली जनगणना में आदिवासी समाज के लोग धर्म के कॉलम में साफ तौर पर 'आदिवासी' लिखवाएं। यह अपील पूर्व विधायक और आदिवासी धर्मचिंतन परिषद के उद्घाटनकर्ता डॉ. नामदेव उसेंडी ने की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान, परंपरा और अस्मिता को बचाए रखने के लिए समाज को एकजुट होकर आगे आना होगा।

यह छठी भव्य आदिवासी धर्मचिंतन परिषद शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 को पोंभुर्णा में हुई। इसका आयोजन बिरसा क्रांति दल, अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, आदिवासी टायगर सेना और कई दूसरे आदिवासी सामाजिक संगठनों ने मिलकर किया था। परिषद में आदिवासी समाज के अलग-अलग क्षेत्रों से आए मान्यवर, सामाजिक कार्यकर्ता, संगठनों के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में समाजबंधु मौजूद थे।

परिषद की अध्यक्षता पूर्व मंत्री और अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एड. शिवाजीराव मोघे ने की। उद्घाटन डॉ. नामदेव उसेंडी के हाथों हुआ। बिरसा क्रांति दल के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष दशरथ मडावी मुख्य मार्गदर्शक के तौर पर आए थे।

इनके अलावा पूर्व आयुक्त संभाजी सरकुंडे, बिरसा क्रांति दल के महाराष्ट्र प्रदेशाध्यक्ष डी. बी. अंबुरे, अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के प्रदेशाध्यक्ष रामसाहेब चव्हाण, संजय मडावी, प्रभाकर गेडाम, व्ही. डी. कोवे, चिंतामन किनाके, रमेश भिसनकर, राजेंद्र मसराम, रवींद्र पेंदाम, शेषराव कोवे, जनार्दन गेडाम, महेंद्र शेडमाके और संतोष कुडमेथे समेत कई मान्यवर हाजिर थे।

उद्घाटन भाषण में डॉ. उसेंडी ने कहा कि आदिवासी समाज की अलग संस्कृति, जीने का तरीका, रीति-रिवाज और धार्मिक आस्थाओं का ऐतिहासिक महत्व है। इस खास पहचान को बचाने के लिए समाज को अपनी धार्मिक अस्मिता के बारे में जागरूक रहना जरूरी है। उन्होंने साफ कहा कि जनगणना में धर्म के कॉलम में 'आदिवासी' दर्ज कराने के लिए समाजबंधु मिलकर पहल करें।

बिरसा क्रांति दल के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष दशरथ मडावी ने समाज की एकजुटता पर जोर दिया। उनके मुताबिक आदिवासियों को साथ लाने के लिए अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के जरिए बड़े पैमाने पर जनजागृति करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज कई जमातों और उपजमातों में बंटा है और उनके बीच एकता को और मजबूत करना वक्त की जरूरत है। मडावी ने यह भी कहा कि पारंपरिक संस्कृति को बढ़ावा देने, ऐतिहासिक विरासत को बचाने और संवैधानिक हक के बारे में जागरूकता फैलाने में धर्मचिंतन परिषदें अहम भूमिका निभा सकती हैं।

बिरसा क्रांति दल के महाराष्ट्र प्रदेशाध्यक्ष डी. बी. अंबुरे ने अलग आदिवासी धर्मकोड की मांग पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि सिर्फ निवेदन देना या मांग करना काफी नहीं है। जनगणना के वक्त समाजबंधुओं को अपनी धार्मिक पहचान के बारे में सजग रहना होगा। अंबुरे के मुताबिक जनगणना में धर्म की दर्ज होने वाली जानकारी इसलिए अहम है कि आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान सरकारी आंकड़ों में साफ दिखे। उन्होंने अलग आदिवासी धर्मकोड की मांग के लिए लोकतांत्रिक रास्ते से संगठित कोशिश करने की अपील भी की।

परिषद में आदिवासी समाज की अलग धार्मिक पहचान, प्राचीन रीति-रिवाज, सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक संगठन, संवैधानिक हक और सर्वांगीण विकास जैसे विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ। समाज के अलग-अलग संगठनों ने आपस में तालमेल रखकर समाज के सवालों पर साथ काम करने की जरूरत भी जताई।

चंद्रपुर जिले समेत विदर्भ के कई हिस्सों से बड़ी तादाद में आदिवासी समाजबंधु परिषद में पहुंचे थे। मौजूद लोगों ने कहा कि मान्यवरों के मार्गदर्शन से समाज में धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर जागरूकता बनाने में मदद मिली।

परिषद को कामयाब बनाने में महेंद्र शेडमाके, जनार्दन गेडाम, इंद्रशहा कडते, अरुण तलांडे, ईवंधर गेडाम, सुखदेव सिडाम, भोला कोवे, प्रतिमा आलाम, रेखा मेश्राम, ललिता कोवे, वर्षा आत्राम, संभाजी आत्राम, दिलीप शेडमाके, जगदीश शेमले, रमेश कनाके, जगण येलके और राजेश शेडमाके समेत कई कार्यकर्ताओं ने सहयोग किया।

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