प्रहार रिव्यू: उज्ज्वल निकम की कहानी में राजकुमार राव मजबूत, कसाब बने ललित प्रभाकर छाए
अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' को 3.5 स्टार की रेटिंग दी गई है।
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अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी फिल्म 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' 2 घंटे 40 मिनट की है। फिल्म में राजकुमार राव, वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर और आशिष विद्यार्थी जैसे मंझे हुए कलाकार नजर आते हैं। फिल्म को 3.5 स्टार की रेटिंग दी गई है।
रिव्यू के मुताबिक कुछ लड़ाइयां सिर्फ दलीलों से नहीं जीती जातीं, उनके लिए बरसों का धैर्य और खुद को झोंक देने वाली जिद चाहिए। 'प्रहार' इसी जिद की कहानी है। फिल्म 26/11 के मुंबई आतंकी हमले के बाद चली कानूनी लड़ाई की पृष्ठभूमि पर बनी है। यह सिर्फ अदालत में इंसाफ की तलाश नहीं दिखाती, बल्कि उस आदमी की जिंदगी में भी झांकती है जो दूसरों को इंसाफ दिलाने की कोशिश में अपने ही रिश्तों से दूर होता गया।
फिल्म के केंद्र में सरकारी वकील उज्ज्वल निकम और अजमल कसाब का मुकदमा है। कहानी में 1993 के बॉम्बे बम धमाकों से जुड़े कानूनी संदर्भ भी आते हैं। यहां हर दलील मायने रखती है और हर कदम के पीछे जिम्मेदारी तय करने का दबाव है। फिल्म कानूनी प्रक्रिया को सिर्फ हार-जीत का खेल नहीं बनाती, उसके पीछे का संघर्ष और जिम्मेदारी भी सामने रखती है।
निकम की निजी जिंदगी कहानी को भावनात्मक मोड़ देती है। बेटे अनिकेत के साथ उनका रिश्ता दिखाता है कि पेशे के प्रति अटूट लगन की कीमत कई बार परिवार को चुकानी पड़ती है। बेटा पिता से मार्गदर्शन और अपनापन चाहता है, लेकिन निकम के लिए अनुशासन और काम की जिम्मेदारी सबसे ऊपर है। यही टकराव फिल्म को एक साधारण कोर्टरूम ड्रामा से आगे ले जाता है।
उज्ज्वल निकम के किरदार में राजकुमार राव शानदार दिखे हैं। उनकी एक्टिंग में फालतू आक्रामकता या फिल्मी हीरो जैसा दिखावा नहीं है। संयमित संवाद, चेहरे के भाव और अदालत में उनका शांत आत्मविश्वास किरदार को भरोसेमंद बनाता है। अहम कानूनी दलीलों के दौरान पर्दे पर उनकी मौजूदगी तनाव पैदा करती है। वे निकम को सिर्फ मजबूत इरादों वाले वकील के रूप में नहीं दिखाते, बल्कि अदालत में भरोसे से खड़ा रहने वाला आदमी घर पर अपनी भावनाएं जताते हुए जब उलझ जाता है, तो उसका दूसरा पहलू भी सामने आता है।
मराठी अभिनेता ललित प्रभाकर ने कसाब के किरदार में बेचैन कर देने वाली तीव्रता दिखाई है। उनके किरदार से जुड़े अहम दृश्य कहानी का तनाव बढ़ाते हैं। ललित अब तक दमदार अभिनय करते आए हैं और कसाब के रोल में वे कैसा काम करेंगे, इसे लेकर सबको उत्सुकता थी। दर्शकों का उन पर जो भरोसा था, उसे उन्होंने सही साबित किया है।
सिकंदर खेर बचाव पक्ष के वकील के रूप में असरदार हैं, जबकि जयदीप अहलावत ने अपने किरदार में गंभीरता और गहराई जोड़ी है। वामिका गब्बी ने ज्योति निकम की भूमिका में परिवार के भावनात्मक पहलू को और मजबूत किया है। आशिष विद्यार्थी न्यायमूर्ति एम. एल. तहलियानी के रोल में गरिमा बनाए रखते हैं। सभी कलाकार कहानी को संभालते हैं और मुख्य संघर्ष से ध्यान भटकने नहीं देते।
अविनाश अरुण का निर्देशन संयमित है। वे अदालती दलीलों, सबूतों और रणनीतियों के जरिए तनाव धीरे-धीरे बढ़ाते हैं। संवाद असरदार हैं, लेकिन फिल्म हर दृश्य को लंबे भाषण में बदलने की गलती नहीं करती। बैकग्राउंड स्कोर अहम मौकों पर सस्पेंस और भावनात्मक गहराई जोड़ता है, और वह भी अभिनय पर हावी हुए बिना।
फिल्म 140 मिनट की है, फिर भी इसमें कोई उबाऊ पल नहीं है। यह पहले दृश्य से आखिरी दृश्य तक अपनी पकड़ और रफ्तार बनाए रखती है। 'प्रहार' सच्ची घटनाओं पर आधारित कोर्ट ड्रामा है, जो कसाब से जुड़े मुकदमे की कानूनी प्रक्रिया और उज्ज्वल निकम के संघर्ष की कहानी दिखाती है, जिसके बारे में ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है।
रिव्यू के मुताबिक फिल्म याद दिलाती है कि इंसाफ की राह सिर्फ अदालत में दलील देने तक सीमित नहीं होती। उसके पीछे बरसों की मेहनत, कठिन फैसले और ऐसे त्याग होते हैं, जिनकी कीमत अक्सर अपनों को चुकानी पड़ती है। गंभीर विषय, दमदार अभिनय और असली घटनाओं पर आधारित कहानियों में दिलचस्पी रखने वाले दर्शकों के लिए 'प्रहार' एक अच्छा विकल्प है।