सूखे की मार के बावजूद वाशिम और बुलढाणा के बाजारों में दिवाली की रौनक, खरीदारों की भीड़
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
लक्ष्मीपूजन की पूर्वसंध्या पर वाशिम और बुलढाणा जिलों के बाजारों में खरीदारों की बड़ी भीड़ उमड़ी। सुबह से शुरू हुई खरीदारी की भागदौड़ शाम तक चरम पर पहुंच गई। कपड़े, मिठाई, नाश्ता, पूजा का सामान, दीये, कंदील और बिजली की रोशनी का सामान बेचने वाली दुकानों में ग्राहकों की आवाजाही बढ़ी, जिससे व्यापारियों में संतोष का माहौल रहा।
यह रौनक ऐसे वक्त दिखी है, जब किसान मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। अनियमित बारिश, सूखे जैसे हालात, सोयाबीन और कपास की पैदावार में गिरावट और उपज को उम्मीद के मुताबिक भाव न मिलने से किसान आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर नजर आ रहा है।
इस साल बारिश में लंबा अंतराल रहा, जिसका असर सोयाबीन की पैदावार पर पड़ा। कपास उगाने वाले किसान अब भी मनचाहे दाम के इंतजार में हैं। लागत और आमदनी का हिसाब बैठाने में किसानों को काफी जूझना पड़ रहा है। इसी वजह से व्यापारी वर्ग को आशंका थी कि इस बार दिवाली की खरीदारी पर सूखे का साया रहेगा। लेकिन त्योहार की खुशी और परंपरा निभाने के लिए लोगों ने अपनी आर्थिक हालत के हिसाब से खरीदारी को तरजीह दी।
दिवाली में नए कपड़े, घर की सजावट, नाश्ते और पूजा के सामान की खास अहमियत होती है। इसी के चलते वाशिम, कारंजा, रिसोड, मंगरूलपीर, मानोरा, बुलढाणा, खामगांव, मलकापुर, चिखली और देउलगांव राजा समेत प्रमुख शहरों के बाजारों में ग्राहकों की बड़ी भीड़ दिखी। कपड़ों की दुकानों में महिलाएं, पुरुष और बच्चे खरीदारी में लगे रहे। साड़ियां, ड्रेस मटेरियल, रेडीमेड कपड़े और बच्चों के आकर्षक कपड़े ग्राहकों को खूब पसंद आए।
घर के सामने रंगोली बनाने के लिए रंग, सजावट के लिए तोरण, फूलों की मालाएं, कंदील, दीये और बिजली की रोशनी का सामान भी बड़ी मात्रा में बिका। तरह-तरह की सजावटी चीजों से दुकानें सजी हैं और बाजारों पर दिवाली का रंग चढ़ गया है।
दिवाली के नाश्ते का खास स्थान होता है, इसलिए चिवड़ा, चकली, गुजिया, लड्डू, शक्करपारे और अनरसे जैसी चीजें खरीदने के लिए लोग दुकानों पर पहुंचे। घर में बने नाश्ते के साथ बना-बनाया नाश्ता भी ग्राहकों को भा रहा है। मिठाई की दुकानों में कई किस्म की मिठाइयां आकर्षक ढंग से सजाई गई हैं। रिश्तेदारों, दोस्तों और जान-पहचान वालों को मिठाई देकर शुभकामनाएं देने की परंपरा है, इसलिए इस खरीदारी में भी जोर दिखा।
खेती की अनिश्चितता और उपज के दामों की वजह से इस साल ग्रामीण इलाकों के लोगों की खर्च करने की क्षमता सीमित हो गई है। खासकर सोयाबीन और कपास उगाने वाले किसान आर्थिक तंगी झेल रहे हैं। इसलिए कई लोगों ने गैरजरूरी खर्च टालकर जरूरी चीजों की खरीदारी को पहले रखा। फिर भी परिवार की खुशी के लिए नए कपड़े, नाश्ता और दिवाली की सजावट का सामान खरीदने में लोगों ने उत्साह दिखाया। बाजार में बढ़ती भीड़ से छोटे कारोबारियों, फेरीवालों, खुदरा विक्रेताओं और दुकानदारों को कुछ हद तक आर्थिक राहत मिली है।
दिवाली छोटे कारोबारियों के लिए साल का अहम सीजन होता है। दीये बेचने वाले, फूल विक्रेता, नाश्ता बेचने वाले, फेरीवाले और खुदरा दुकानदार दिवाली के कारोबार पर बहुत निर्भर रहते हैं। इस बार सूखे के हालात की वजह से खरीदारी घटने का डर था। लेकिन लक्ष्मीपूजन की पूर्वसंध्या पर बाजार में बढ़ी भीड़ से इन कारोबारियों को भी कुछ राहत मिली।
खरीदारों की तादाद बढ़ने से प्रमुख बाजारों की सड़कों पर वाहनों और पैदल लोगों की भारी आवाजाही रही। कुछ जगह यातायात जाम हुआ और पार्किंग के लिए वाहन चालकों को परेशानी हुई। जगह ढूंढने में लोगों को दिक्कत झेलनी पड़ी, फिर भी भीड़ के बीच खरीदारी का उत्साह बना रहा। शाम को बिजली की रोशनी से जगमगाते बाजारों में लोगों की चहल-पहल और बढ़ गई। एक तरफ किसानों के घरों में आर्थिक चिंता का माहौल है, तो दूसरी तरफ दिवाली के मौके पर बाजारों में आई रौनक से व्यापारी वर्ग को राहत मिली है।


कमेंट
अभी कोई कमेंट नहीं। पहले आप लिखिए।