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रविवार, 8 नवंबर 2026

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लक्ष्मीपूजन पर खील और बताशे का भोग क्यों लगता है, जानिए धार्मिक मान्यता और सेहत की बातें

लक्ष्मीपूजन पर खील और बताशे का भोग क्यों लगता है, जानिए धार्मिक मान्यता और सेहत की बातें तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

लक्ष्मीपूजन पर माता लक्ष्मी को खील और बताशे का भोग लगाने की पुरानी परंपरा है। इसके पीछे धार्मिक मान्यताएं हैं और खाने से जुड़ी कुछ बातें भी।

दिवाली में लक्ष्मीपूजन को सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य का उत्सव माना जाता है। इस दिन देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की विधि से पूजा होती है और उन्हें तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है। इन पकवानों में खील और बताशे का खास महत्व है। महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में लक्ष्मीपूजन के वक्त खील-बताशे चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है।

माना जाता है कि खील-बताशे का भोग लगाने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसे श्रद्धा, परंपरा और मिठास को जोड़ने वाली प्रथा भी कहा जाता है। इस परंपरा के पीछे सिर्फ धार्मिक आस्था ही नहीं है, खाने-पीने से जुड़े कुछ पारंपरिक कारण भी बताए जाते हैं।

पहले धार्मिक पहलू की बात करें। भारतीय संस्कृति में अनाज को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक भावना यह है कि जहां अन्न-धान की भरमार है, वहां लक्ष्मी का वास है। खील अनाज से ही बनती है। इसलिए लक्ष्मीपूजन में देवी को खील का भोग लगाकर प्रार्थना की जाती है कि घर में हमेशा अन्न-धान की समृद्धि रहे।

बताशे चीनी से बनते हैं और मिठास और मंगल के प्रतीक माने जाते हैं। इन्हें चढ़ाने के पीछे भावना यह होती है कि परिवार के लोगों में प्रेम, खुशी और एकता बनी रहे और जिंदगी में मिठास रहे।

एक और वजह नए अनाज के लिए आभार जताना है। खेती और अनाज का भारतीय संस्कृति में खास स्थान है। कुछ इलाकों में नई फसल के अनाज की खील देवता को चढ़ाने की परंपरा है। इसके जरिए प्रकृति, किसान और अन्न के प्रति कृतज्ञता जताई जाती है।

अब सेहत की बात। खील चावल या दूसरे अनाज को भूनकर फुलाने से बनती है। हल्की होने की वजह से कई पारंपरिक आहारों में इसे शामिल किया जाता है। ठीक मात्रा में खाई जाए तो यह पेट पर भारी नहीं पड़ती। चावल की खील में कार्बोहाइड्रेट होते हैं, जिससे शरीर को ऊर्जा मिलती है। तेल या घी डाले बिना बनी सादी खील में चिकनाई कम होती है। साधारण खील ठीक मात्रा में खाने पर कई लोगों को आसानी से पच जाती है, हालांकि पाचन हर व्यक्ति में अलग हो सकता है।

बताशे मुख्य रूप से चीनी से बनते हैं, इसलिए वे शरीर को झटपट ऊर्जा दे सकते हैं। चीनी से मिलने वाली यह ऊर्जा कुछ देर की होती है। बताशे में पोषक तत्व सीमित होते हैं। पारंपरिक भोग में मीठी चीज के तौर पर बताशे को शामिल किया जाता है। उनमें चीनी ज्यादा होती है, इसलिए उन्हें सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए।

भोग लगाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। भोग के लिए साफ और ताजी खील-बताशे लेनी चाहिए। इन्हें अलग-अलग थाली में या एक साथ चढ़ाया जा सकता है। पूजा के बाद इसे प्रसाद के तौर पर परिवार के लोगों में बांटा जाता है। डायबिटीज वाले लोगों को बताशे कम खाने चाहिए। सेहत के लिहाज से खील-बताशे मात्रा में ही खाना ठीक रहता है।

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