श्रद्धा कपूर की फिल्म 'ईठा' में लावणी कलाकार विठाबाई की कहानी, राज कपूर का ऑफर ठुकराया था
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श्रद्धा कपूर की आने वाली फिल्म 'ईठा' महाराष्ट्र की मशहूर लावणी और तमाशा कलाकार विठाबाई पर बनी है। फिल्म 4 दिसंबर को सिनेमाघरों में आएगी।
श्रद्धा कपूर की आने वाली फिल्म 'ईठा' एक बायोपिक है। इसमें श्रद्धा ने महाराष्ट्र की मशहूर लावणी और तमाशा कलाकार विठाबाई का किरदार निभाया है। फिल्म विठाबाई की जिंदगी पर आधारित है और 4 दिसंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। फैन्स को इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार है।
विठाबाई का जन्म महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के पंढरपुर गांव में हुआ था। वे कलाकारों के परिवार में पली-बढ़ीं। उनके पिता और चाचा भाऊ-बापू मंग नारायणगावकर कला मंडली चलाते थे। इस मंडली की शुरुआत उनके दादा नारायण खुदे ने की थी, जो पुणे जिले के शिरूर तालुका के कवठे यमाई गांव के रहने वाले थे।
बचपन से ही विठाबाई का वास्ता लावणी, गवलण और भेदिक जैसी अलग-अलग तरह की गायकी से रहा। पढ़ाई-लिखाई नहीं होने के बावजूद उन्होंने बिना किसी ट्रेनिंग के बहुत छोटी उम्र में ही स्टेज पर शानदार परफॉर्मेंस दी। हालात कैसे भी रहे, उन्होंने अपनी कला कभी नहीं छोड़ी। अपनी मेहनत, संघर्ष और हुनर के दम पर वे देश की सबसे मशहूर लावणी और तमाशा कलाकारों में गिनी गईं।
उनकी शोहरत इतनी बढ़ी कि भारतीय सिनेमा के बड़े फिल्मकार और अभिनेता राज कपूर भी उनके फैन बन गए। उनकी कला से प्रभावित होकर राज कपूर ने उन्हें अपनी फिल्म में रोल का ऑफर दिया, लेकिन विठाबाई ने नरमी से मना कर दिया।
मना करने की वजह थी रंगभूमि और वहां के कलाकारों के लिए उनका लगाव। उनका मानना था कि अगर वे फिल्मों में चली गईं, तो उनकी नाट्य मंडली के कलाकारों की रोजी-रोटी चली जाएगी, क्योंकि वे पूरी तरह उनके कार्यक्रमों पर निर्भर थे।
विठाबाई की जिंदगी का सबसे असरदार वाकया तब हुआ, जब उन्होंने बच्चे को जन्म देने के बाद आराम करने के बजाय परफॉर्म करने का फैसला किया। वे नौ महीने की गर्भवती थीं और एक लाइव कार्यक्रम के दौरान अचानक उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।
कार्यक्रम में खलल डालने के बजाय वे चुपचाप स्टेज के पीछे गईं और एक तेज पत्थर से बच्चे की नाल काटकर खुद ही बच्चे को जन्म दिया। अपने जख्मों पर पट्टी बांधने के बाद वे फौरन लावणी पेश करने के लिए स्टेज पर लौट आईं। जब दर्शकों को यह बात पता चली, तो वे हैरान रह गए और इज्जत जताने के लिए उन्होंने उसी वक्त कार्यक्रम रुकवा दिया।
कला के क्षेत्र में योगदान के लिए विठाबाई को 1957 और 1990 में राष्ट्रपति के हाथों दो बार सम्मानित किया गया। उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला। उनके सम्मान में अब महाराष्ट्र सरकार उनके नाम से लोक कलाकारों को पुरस्कार देती है।
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