मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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19:52 IST

जेष्ठ लावणी कलाकार शकुंतला नगरकर का 66 साल की उम्र में निधन

50 साल से ज्यादा वक्त तक लावणी कला को जिंदा रखने वाली शकुंतला नगरकर कैंसर से जूझ रही थीं।

जेष्ठ लावणी कलाकार शकुंतला नगरकर का 66 साल की उम्र में निधन
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

महाराष्ट्र के लोककला और लावणी क्षेत्र से एक दुखद खबर सामने आई है। जेष्ठ लावणी नृत्यांगना शकुंतला नगरकर का 66 साल की उम्र में निधन हो गया है। पिछले कुछ वक्त से वे कैंसर से जूझ रही थीं। उनके निधन की खबर आज सामने आई, जिसके बाद लावणी और महाराष्ट्र के लोककला क्षेत्र से जुड़े कई कलाकार, रसिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के जाने-माने लोगों ने शोक जताया है।

अहिल्यानगर की रहने वाली शकुंतला नगरकर ने अपनी जिंदगी के पांच दशक से ज्यादा वक्त लावणी कला को दिया। सिर्फ 11 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार घुंगरू बांधे और लावणी के क्षेत्र में कदम रखा। इसके बाद पुणे, सोलापुर और बेळगाव जैसे इलाकों में उनकी कला का सफर आगे बढ़ता रहा।

शकुंतला नगरकर की पहचान खासकर पारंपरिक संगीत बारी और बैठकी की लावणी की नृत्यांगना के तौर पर थी। लावणी में भावमुद्रा, अदाकारी, नजाकत और शृंगारिक पेशकश पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी। उनकी परफॉर्मेंस में पारंपरिक लावणी की शैली और लोककला की छाप साफ दिखती थी।

लावणी को सिर्फ पारंपरिक तमाशा के फड तक सीमित न रखते हुए उसे बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाने में भी उनका योगदान रहा। डायरेक्टर भूषण कोरगावकर के नाट्यप्रयोग 'संगीत बारी' के जरिए उन्होंने आधुनिक शहरी दर्शकों के सामने बैठकी की लावणी की परंपरा को पेश किया।

कला क्षेत्र में उनके योगदान को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। राज्य सरकार के शाहीर पठ्ठे बापूराव पुरस्कार समेत उन्हें और भी कई सम्मान मिले थे। उनके निधन के बाद महाराष्ट्र के लोककला क्षेत्र में उनके योगदान को फिर से याद किया जा रहा है।

बता दें, संगीत नाटक अकादमी केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी एक राष्ट्रीय स्तर की मंचकला संस्था है, जिसके पुरस्कार संगीत, नृत्य, नाटक और पारंपरिक व लोककलाओं के क्षेत्र में योगदान के लिए दिए जाते हैं।

शकुंतला नगरकर के निधन के बाद भाजपा के महाराष्ट्र प्रदेशाध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी। चव्हाण ने अपनी पोस्ट में कहा कि उनके निधन से महाराष्ट्र के लोककला क्षेत्र के एक अहम दौर का अंत हो गया है।

शकुंतला नगरकर ने अपने लंबे कला सफर में पारंपरिक लावणी, संगीत बारी और बैठकी की लावणी की परंपरा को बचाए रखने का काम किया। उनके निधन से इस क्षेत्र के एक अनुभवी कलाकार के चले जाने का एहसास जताया जा रहा है।

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