मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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17:26 IST

SIR वोटर लिस्ट साफ करने का ही तरीका है, शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम का बयान

चुनाव आयोग और वोटर लिस्ट की गहन जांच पर छिड़े सियासी विवाद के बीच शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने विपक्ष के आरोपों पर पलटवार किया।

SIR वोटर लिस्ट साफ करने का ही तरीका है, शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम का बयान
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

मुंबई में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने चुनाव आयोग और वोटर लिस्ट की गहन जांच को लेकर चल रहे सियासी बवाल पर विपक्ष को करारा जवाब दिया। निरुपम ने कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और मुख्य चुनाव आयुक्त समेत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान और कानून से तय है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे में इस्तीफा देने जैसी भाषा का इस्तेमाल संवैधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं के हिसाब से गलत है। निरुपम ने आरोप लगाया कि SIR को लेकर विपक्ष जानबूझकर कन्फ्यूजन फैला रहा है।

निरुपम ने कहा कि चुनाव में हार के बाद चुनाव आयोग पर आरोप लगाना और 'वोट चोरी' का नैरेटिव खड़ा करना विपक्ष की राजनीति का हिस्सा बन गया है। उन्होंने कहा कि चुनाव का नतीजा अपने पक्ष में न आने पर संवैधानिक संस्थाओं की साख पर सवाल उठाना लोकतंत्र के लिए सही परंपरा नहीं है।

उन्होंने आगे कहा कि युवाओं की बेरोजगारी, शिक्षा, परीक्षा और पेपर लीक जैसे मुद्दे उठाए जा सकते हैं, लेकिन इन मुद्दों की आड़ में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं या राजनीतिक पार्टियों पर बेबुनियाद आरोप लगाना ठीक नहीं है।

SIR को लेकर विपक्ष के एतराज पर जवाब देते हुए निरुपम ने कहा कि वोटर लिस्ट में मरे हुए, स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके, गैरहाजिर या डबल वोटरों की पहचान करके नियम के मुताबिक लिस्ट को अपडेट करना चुनाव व्यवस्था का ही हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया को सीधे 'वोट चोरी' से जोड़ना गलत है।

बिहार और पश्चिम बंगाल में हुई इसी तरह की प्रक्रिया का हवाला देते हुए निरुपम ने बताया कि वोटर लिस्ट में नामों को लेकर दावे-आपत्ति दर्ज कराने और जरूरी कागजात वेरिफाई कराने का पूरा सिस्टम मौजूद है। इसलिए SIR के तहत किसी नाम पर एतराज हो तो उसके लिए उपलब्ध कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

महाराष्ट्र की वोटर लिस्ट को लेकर निरुपम ने दावा किया कि बड़ी तादाद में ऐसे वोटरों के नाम सामने आए हैं जिनकी असल में पड़ताल जरूरी है। उनके मुताबिक करीब 76 लाख वोटर 'गैरहाजिर', लगभग 75 लाख वोटर स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके, करीब 34 लाख मृत वोटर और लगभग 17 लाख डबल वोटरों के नाम बताए जा रहे हैं।

निरुपम ने कहा कि अगर मृत, स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके या डबल वोटरों के नाम नियमानुसार लिस्ट से हटाए जा रहे हैं, तो इस पर सियासी विवाद खड़ा करने के बजाय वोटर लिस्ट की सटीकता और शुद्धता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के आरोपों पर भी निरुपम ने एतराज जताया। उन्होंने कहा कि चुनाव में हार के लिए किसी चुनाव आयुक्त या पूरी चुनाव प्रक्रिया को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। निरुपम ने भाजपा और दूसरी पार्टियों से भी अपील की कि वे चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की साख के साथ मजबूती से खड़े रहें।

चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की कथित चिट्ठियों को लेकर उठे विवाद पर निरुपम ने कहा कि किसी भी संस्था में फैसला लेते वक्त अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन आखिरी फैसला संस्थागत व्यवस्था के हिसाब से ही लिया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर संबंधित आयुक्त किसी फैसले से असहमत थे, तो क्या उन्होंने बैठक में औपचारिक तौर पर 'नोट ऑफ डिसेंट' दर्ज कराया था।

शिवसेना को 'शेल कंपनी' या 'प्रॉक्सी पार्टी' कहे जाने पर भी निरुपम ने सख्त एतराज जताया। उन्होंने कहा कि पार्टियों में फूट पड़ना या नई पार्टी बनना भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है, और कांग्रेस, एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस समेत कई पार्टियों के इतिहास में ऐसा हो चुका है।

निरुपम ने कहा कि 2024 के चुनावों में महाराष्ट्र के वोटरों ने एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना के उम्मीदवारों को वोट दिया और पार्टी के विधायक-सांसद चुनकर आए। इसलिए पार्टी के राजनीतिक वजूद पर सवाल उठाना मतलब वोटरों के दिए गए जनादेश पर ही सवाल उठाना है। उन्होंने कहा कि चुनाव में जीत-हार को संवैधानिक संस्थाओं की साख से जोड़ना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में नहीं है।

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