सातारा में गन्ना किसानों का हाईवे जाम जारी, 4500 रुपये टन से कम पर वापसी नहीं
सातारा में गन्ने के भाव पर कलेक्टर दफ्तर की बैठक बेनतीजा रही। स्वाभिमानी शेतकरी संगठन ने पुणे-बेंगलुरु हाईवे पर चल रहा आंदोलन वापस लेने से साफ मना कर दिया है।
सातारा में गन्ने के भाव को लेकर किसान सड़क पर उतर आए हैं। उन्होंने हाईवे रोक दिया, ट्रैफिक ठप हो गया और आखिरकार प्रशासन को बातचीत के लिए आगे आना पड़ा। लेकिन कलेक्टर दफ्तर में हुई बैठक में किसानों के हाथ कोई ठोस फैसला नहीं लगा। बैठक में सिर्फ आश्वासन मिलते रहे। इसी वजह से स्वाभिमानी शेतकरी संगठन ने आंदोलन वापस लेने से साफ इनकार कर दिया है। संगठन का कहना है कि जब तक भाव का पक्का हल नहीं निकलता, हाईवे पर लड़ाई चलती रहेगी।
किसानों की मांग है कि गन्ने का भाव साढ़े चार हजार रुपये प्रति टन मिले और एथेनॉल का भाव 70 रुपये प्रति लीटर हो। इसी मांग को लेकर पिछले तीन दिन से पुणे-बेंगलुरु हाईवे पर रास्ता रोको आंदोलन चल रहा है। आंदोलनकारियों ने गुस्से में सवाल उठाया कि कर्नाटक और गुजरात में गन्ने को ज्यादा भाव मिल रहा है, तो महाराष्ट्र के किसानों के साथ ही नाइंसाफी क्यों हो रही है। उनका यह भी कहना है कि चुनाव के समय किसानों के साथ खड़े होने की बात करने वाले जनप्रतिनिधि अब भाव पर ठोस फैसला क्यों नहीं ले रहे।
कलेक्टर दफ्तर की बैठक में पालकमंत्री शंभूराज देसाई ने माना कि किसान संगठनों का रुख सही है। उन्होंने कहा कि चीनी का न्यूनतम बिक्री भाव पांच हजार रुपये तक बढ़ाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, यानी फैसला केंद्र को करना है। साथ ही उन्होंने निर्देश दिया कि कारखाने वाले शुक्रवार को नोटिस बोर्ड पर बताएं कि वे एफआरपी से ज्यादा कितना भाव देंगे। देसाई ने दिवाली का त्योहार देखते हुए आंदोलन टालने की अपील भी की। मगर आंदोलनकारियों ने कहा कि सिर्फ अपील से मसला हल नहीं होगा।
मंत्री शिवेंद्रसिंहराजे भोसले ने कारखानों की माली हालत, चीनी के बाजार भाव, बैंकों की कर्ज वसूली और उत्पादन लागत का हिसाब सामने रखा। सांसद नितिन पाटील ने भी चीनी का न्यूनतम बिक्री भाव बढ़ाने की जरूरत बताई। कारखानदारों के प्रतिनिधियों ने अपनी आर्थिक दिक्कतें गिनाईं। लेकिन किसानों की उत्पादन लागत और उन पर कर्ज के बोझ का क्या होगा, इसका जवाब बैठक से नहीं मिला।
कारखानदारों ने कोई पक्का आंकड़ा बताने के बजाय आर्थिक हालात का हवाला दिया। इससे किसान संगठनों का गुस्सा बना हुआ है। स्वाभिमानी शेतकरी संगठन का कहना है कि एफआरपी से ज्यादा भाव की लिखित घोषणा और उस पर असल में अमल हुए बिना आंदोलन वापस नहीं होगा। बातचीत के दौर भले चल रहे हों, हाईवे का आंदोलन खत्म होता नहीं दिख रहा। अब किसानों की नजर इस पर है कि प्रशासन और कारखानदार ठोस कदम कब उठाते हैं।
बैठक में पालकमंत्री शंभूराज देसाई, मंत्री शिवेंद्रसिंहराजे भोसले, सांसद नितिन पाटील, विधायक धैर्यशील कदम, कलेक्टर संतोष पाटील, पुलिस अधीक्षक निखिल पिंगले, कारखानदारों के प्रतिनिधि और अलग-अलग किसान संगठनों के पदाधिकारी मौजूद थे।
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