गुरूवार, 5 नवंबर 2026

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अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प की पार्टी हारी, सेंसेक्स 2000 से ज्यादा अंक उछला

कारोबार PT24 कारोबार डेस्क

अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार के बाद कच्चा तेल सस्ता हुआ और भारतीय शेयर बाजार में तेजी आई। जानिए रुपये, पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर इसका क्या असर हो सकता है।

अमेरिका की राजनीति में हुई उथल-पुथल का सीधा असर अब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और भारत के शेयर बाजार पर दिख रहा है। अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद वैश्विक बाजारों के साथ भारतीय बाजार में भी जबरदस्त तेजी आई। एक ही सत्र में सेंसेक्स 2000 से ज्यादा अंक चढ़ गया।

अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है, जबकि संसद यानी कांग्रेस के सदस्यों का चुनाव हर दो साल में होता है। राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में होने वाले इन चुनावों को मिडटर्म इलेक्शन कहा जाता है। इसमें जनता पिछले दो साल के कामकाज पर अपनी राय जाहिर करती है।

इस बार के नतीजे ट्रम्प की पार्टी के लिए बड़ा झटका रहे। डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों, सिनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्ज, पर अपना कब्जा जमा लिया है। नतीजों से साफ है कि ईरान के साथ चल रहे संघर्ष, देश के भीतर बढ़ते सैन्य खर्च और महंगाई जैसे मुद्दों पर अमेरिकी मतदाता ट्रम्प प्रशासन से नाराज थे।

संसद में डेमोक्रेट्स का दबदबा बढ़ने से ट्रम्प के लिए युद्ध और सैन्य नीति से जुड़े फैसले लेना अब पहले जितना आसान नहीं रहेगा। संसद अब सैन्य खर्च और प्रशासन की नीतियों पर कड़ी नजर रखेगी। बाजार ने इस बदलाव को अच्छे संकेत की तरह लिया। निवेशकों का मानना है कि अमेरिका पर बढ़ते राजनीतिक दबाव से मिडल ईस्ट का तनाव घट सकता है। खासकर ईरान के साथ चल रहे संघर्ष को खत्म करने की दिशा में कदम उठाए जाने की मजबूत संभावना बनी है। इसी उम्मीद से दुनिया भर के बाजारों में नया जोश आया और भारतीय बाजार में भी भारी खरीदारी हुई।

कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ मांग और सप्लाई पर नहीं टिकतीं। राजनीतिक तनाव और युद्ध की आशंका का भी इन पर बड़ा असर पड़ता है। ईरान और पश्चिम एशिया के संघर्ष की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य, यानी Strait of Hormuz, से होने वाली तेल की आवाजाही पर असर पड़ने का डर था। यह रास्ता दुनिया के तेल और गैस के कारोबार के लिए बेहद अहम है। इसी डर से कच्चा तेल चढ़ा हुआ था। लेकिन अमेरिकी चुनाव के बाद जंग जल्दी खत्म होने या तनाव घटने की संभावना बनी, तो कच्चा तेल सीधे नीचे आ गया। ब्रेंट क्रूड की कीमत तेजी से गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई, जिससे भारत जैसे देशों को बड़ी राहत मिली है।

शेयर बाजार में कई दिन की गिरावट के बाद जोरदार उछाल आया। बीएसई का सेंसेक्स 2000 से ज्यादा अंक की छलांग लगाकर 79,310 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं एनएसई का निफ्टी 576 अंक उछलकर 24,536 पर टिका। इस रैली से निवेशकों की अच्छी कमाई हुई। बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैपिटल 7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बढ़ गया। भारतीय शेयर बाजार अब 5 ट्रिलियन डॉलर के क्लब की ओर मजबूत कदम बढ़ा रहा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, यानी FPIs, भी भारतीय बाजार में बड़े पैमाने पर खरीदारी करते रहे हैं। सिर्फ कुछ दिनों में उन्होंने भारतीय इक्विटी में करीब 25,000 करोड़ रुपये लगाए हैं।

भारत अपनी जरूरत का 88.7% कच्चा तेल बाहर से मंगाता है, और इसकी कीमत डॉलर में चुकानी पड़ती है। कच्चा तेल सस्ता होने से आयात का बिल घटेगा, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाते के घाटे को सुधारने में मदद मिलेगी। तेल सस्ता होने से घरेलू बाजार में अमेरिकी डॉलर की मांग कुछ कम हो सकती है। इससे रुपये को मजबूती मिली है और वह दो हफ्ते के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।

आम आदमी के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि पेट्रोल और डीजल सस्ता होगा या नहीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड सस्ता हुआ है, फिर भी भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम फौरन नहीं घटते। यहां ईंधन के दाम रुपया-डॉलर विनिमय दर, रिफाइनिंग खर्च, ढुलाई और केंद्र व राज्य सरकारों के अलग-अलग टैक्स पर निर्भर करते हैं। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल लंबे समय तक सस्ता रहा, तभी कंपनियां और सरकार दाम घटाने का फैसला ले सकती हैं। डीजल और पेट्रोल सस्ते या स्थिर रहें, तो माल ढुलाई और खेती का खर्च घटता है। इससे सब्जी, अनाज और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर महंगाई का दबाव कम करने में मदद मिलती है।

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव का असर वैश्विक राजनीति के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखा है। ट्रम्प की पार्टी की हार से पश्चिम एशिया का तनाव खत्म होने और कच्चा तेल सस्ता होने की जो उम्मीद बनी है, उसे भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अच्छा माना जा रहा है। हालांकि यह सिर्फ शुरुआती जोश है या लंबे समय का बदलाव, यह आगे की भू-राजनीतिक घटनाओं पर निर्भर करेगा।

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