शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

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03:10 IST

सातारा जिला बैंक चुनाव: राजापूरे दंपति के आवेदन रद्द, संजय शिंदे का निर्विरोध रास्ता आसान

महाबलेश्वर सर्कल में राजापुरे दंपति के नामांकन खारिज होने से संजय शिंदे के निर्विरोध चुने जाने की संभावना बनी है, शिंदे गुट की ताकत बढ़ती दिख रही है।

सातारा जिला बैंक चुनाव: राजापूरे दंपति के आवेदन रद्द, संजय शिंदे का निर्विरोध रास्ता आसान तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

सातारा जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के चुनाव में सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाले गुट की ताकत बढ़ने के संकेत मिलने लगे हैं।

महाबलेश्वर क्षेत्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस के राजेंद्र राजापूरे और रूपाली राजापूरे के उम्मीदवारी आवेदन रद्द हो गए हैं। नामांकन की छानबीन में राजापूरे दंपति को यह झटका लगा। इसके बाद संजय शिंदे के निर्विरोध चुने जाने की संभावना बन गई है और उनका रास्ता आसान दिख रहा है। हालांकि निर्विरोध चुनाव पर आखिरी मुहर तभी लगेगी, जब चुनाव की आगे की घटनाएं उसके मुताबिक रहें। फिर भी इन घटनाओं का सियासी संदेश साफ है कि जिला बैंक में प्रतिनिधित्व की लड़ाई में शिंदे गुट के लिए हालात अनुकूल बन रहे हैं।

दूसरी तरफ शेखर गोरे का नाम भी चर्चा में है। वे ग्रामीण विकास मंत्री जयकुमार गोरे के भाई हैं और हाल ही में शिंदे गुट में शामिल हुए हैं। अब वे मान सेवा सोसायटी निर्वाचन क्षेत्र से किस्मत आजमाने की तैयारी में हैं। इसलिए उनकी उम्मीदवारी सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जिला बैंक में शिंदे गुट के सियासी असर की परीक्षा भी बन सकती है। उनकी लड़ाई में सहकारिता क्षेत्र का स्थानीय नेतृत्व, संस्थाओं का साथ और सियासी तालमेल, ये तीनों बातें अहम रहेंगी।

प्रभारी मंत्री शंभूराज देसाई के लिए भी यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन सकता है। दत्त पंचवार्षिक में मिली हार की यादें पीछे छोड़कर वे फिर से जिला बैंक की राजनीति में सक्रिय होने को तैयार दिख रहे हैं। उनके तजुर्बे और सियासी संपर्कों का शिंदे गुट को कितना फायदा मिलता है, यह देखना अहम होगा।

एक तरफ राजापूरे दंपति के आवेदन रद्द होने से संजय शिंदे को मिली सहूलियत है, दूसरी तरफ शेखर गोरे की संभावित उम्मीदवारी और शंभूराज देसाई की सक्रियता है। ये सारी बातें मिलकर शिंदे गुट के पक्ष में माहौल बना रही हैं। लेकिन जिला बैंक की सत्ता आखिर किसके हाथ जाएगी, इसका फैसला उम्मीदवारी, वोटों की जुगाड़ और पर्दे के पीछे होने वाली सियासी बातचीत पर टिका रहेगा। इसलिए मौजूदा बढ़त शिंदे गुट को भरोसा देने वाली लगती हो, तब भी अंतिम नतीजे तक सहकारिता की सियासी चालें ही निर्णायक रहेंगी।

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