मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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17:46 IST

सातारा जिला बैंक चुनाव: 21 सीटों पर 236 अर्ज़ी, महायुति के भीतर खींचतान

सातारा जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के चुनाव में महायुति के तीनों दल साथ लड़ने की बात कर रहे हैं, पर 21 निदेशक पदों के लिए 236 अर्ज़ी आई हैं।

सातारा जिला बैंक चुनाव: 21 सीटों पर 236 अर्ज़ी, महायुति के भीतर खींचतान
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

सातारा जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक का चुनाव अब सिर्फ सहकारी क्षेत्र का चुनाव नहीं रह गया है। जिले में राजनीतिक दबदबा किस तरफ जाएगा, यह चुनाव उसकी दिशा तय करने वाला बड़ा राजनीतिक अखाड़ा बन गया है। महायुति के तहत भाजपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। फिर भी 21 निदेशक पदों के लिए पूरे 236 अर्ज़ी दाखिल हुई हैं, इसलिए महायुति के अंदर ही जोरदार खींचतान चल रही है।

मंत्री शिवेंद्रसिंहराजे भोसले और मंत्री मकरंद पाटील जिला बैंक की राजनीति में पहले से अहम चेहरे हैं। उनके लिए यह चुनाव अंदर आने की नहीं, बल्कि अपना मौजूदा असर और मजबूत करने की लड़ाई है। दूसरी तरफ राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पालकमंत्री शंभूराज देसाई और ग्रामविकास मंत्री जयकुमार गोरे को जिला बैंक की राजनीति में उम्मीद के मुताबिक जगह नहीं मिली। यह भी चर्चा है कि इसी वजह से वे बैंक की सत्ता में अपनी अलग ताकत दिखाना चाहते हैं। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि महायुति की रणनीति वाली बैठक में देसाई और गोरे मौजूद नहीं थे। इसी पृष्ठभूमि में भाजपा की 'तिरकी चाल' आखिर किसे साधेगी, यह सवाल जिले की राजनीति में चर्चा में है।

बैंक की सत्ता के समीकरण में सांसद उदयनराजे भोसले, पूर्व सभापति रामराजे नाईक-निंबालकर, मंत्री मकरंद पाटील और मंत्री शिवेंद्रसिंहराजे भोसले मुख्य घटक होंगे। पहले खबर आई थी कि उदयनराजे के समर्थकों के पास करीब 250 ठराव हैं। वहीं यह भी बताया गया है कि शिवेंद्रसिंहराजे, मकरंद पाटील, नितीन पाटील और रामराजे नाईक-निंबालकर के पास भी बड़ी मतदाता ताकत है। इसलिए सीटों के बंटवारे के वक्त हर गुट की ताकत और उसकी अपेक्षा सबसे अहम मुद्दा रहेगी। अब सवाल यह नहीं कि कौन किसके साथ है, बल्कि यह है कि किसे साथ लेने से अपना गणित मजबूत होगा।

महाविकास आघाड़ी के कई नेताओं के सहकारी चीनी कारखानों, सहकारी संस्थाओं और अलग-अलग कारोबारी क्षेत्रों में महायुति के नेताओं से करीबी रिश्ते हैं, ऐसी चर्चा सातारा के राजनीतिक गलियारों में हमेशा होती रही है। कारोबार और राजनीति को अलग रखकर सार्वजनिक तौर पर अलग रुख लेने की परंपरा महाराष्ट्र की सहकारी राजनीति में नई नहीं है। इसलिए राजनीतिक जानकारों की नजर इस पर भी है कि चुनाव में दिखने वाली राजनीति और परदे के पीछे के समीकरणों में कितना फर्क रहता है। कौन सा गुट किसका खुलकर विरोध करता है और असल वोटों के गणित में किसकी मदद किसे मिलती है, यह नाम वापसी के बाद ज्यादा साफ हो सकता है।

सातारा जिले की सहकारी राजनीति पर बरसों तक असर डालने वाले वरिष्ठ नेतृत्व के बाद जिले में राजनीतिक और सहकारी सत्ता का केंद्र किसके हाथ में जाएगा, यह सवाल अब जिला बैंक चुनाव के बहाने सामने आ गया है। पहले भी अलग-अलग चुनावों में सहकारी संस्थाओं, चीनी कारखानों, जिला परिषद और स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के समीकरणों का असर एक-दूसरे पर पड़ता रहा है। इसलिए जिला बैंक के चुनाव को आगे के राजनीतिक नेतृत्व की रिहर्सल माना जा रहा है।

इस पूरे गणित में सहकारी चीनी कारखानों का मुद्दा बेहद अहम रहेगा। सह्याद्री, कृष्णा और किसनवीर जैसे कारखानों से जुड़ी सहकारी संस्थाएं, गन्ना उत्पादक और स्थानीय राजनीतिक समीकरण जिला बैंक की राजनीति पर असर डाल सकते हैं। सहकारी क्षेत्र में चर्चा है कि गन्ने के दाम में बड़ा फर्क आया तो उसका सीधा असर कारखानों की पेराई और किसानों के आर्थिक गणित पर पड़ सकता है। दाम में करीब 100 रुपये का फर्क पड़ा तो कुछ कारखाने चालू रहेंगे या नहीं, यह सवाल भी खड़ा हो सकता है। इसलिए हर गुट को यह भी सोचना होगा कि किस राजनीतिक गुट को साथ लेने से चीनी कारखानों का गणित उसके पक्ष में रहेगा।

जिला परिषद अध्यक्ष के चुनाव के बाद महायुति के घटक दलों में तालमेल को लेकर सवाल उठे थे। उसी पृष्ठभूमि में तीनों दलों ने जिला बैंक चुनाव में साथ आने का फैसला किया। लेकिन सीट बंटवारे और उम्मीदवारी को लेकर अब भी बड़ी उत्सुकता बनी हुई है। राजनीतिक गलियारों में अब एक ही चर्चा है कि जिला परिषद में दिखा 'ट्रेलर' क्या जिला बैंक में पूरी फिल्म बनेगा। 21 सीटों के लिए 236 अर्ज़ियों ने अखाड़ा पहले ही गरमा दिया है। 5 अक्टूबर की छंटनी और उसके बाद की नाम वापसी असली मोड़ साबित होगी।

महायुति एक रहती है या अंदरूनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भारी पड़ती हैं, भाजपा सहकारिता में अपनी ताकत बढ़ाती है या राष्ट्रवादी का पारंपरिक असर कायम रहता है, शिवसेना अपनी अलग जगह बना पाती है या नहीं, और उदयनराजे, रामराजे, शिवेंद्रसिंहराजे व मकरंद पाटील की भूमिका क्या रहती है, इन्हीं पर सातारा जिला बैंक के अगले सत्ता केंद्र का फैसला टिका है। सहकारिता का गढ़, चीनी कारखानों का गणित और राजनीतिक दबदबे की लड़ाई, तीनों के मेल से यह चुनाव सातारा की राजनीति का सबसे अहम मुकाबला बनता दिख रहा है।

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