सातारा जिला बैंक चुनाव में 97.92 फीसदी वोटिंग, 12 सीटों पर 28 उम्मीदवार मैदान में
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सातारा जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के चुनाव में 2,021 में से 1,979 मतदाताओं ने वोट डाला। 3 नवंबर को मतगणना होगी।
सातारा जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक के चुनाव में इस बार रिकॉर्ड वोटिंग हुई है। जिले की सभी ग्यारह तहसीलों में कुल 2 हजार 21 मतदाता थे और इनमें से 1 हजार 979 ने वोट डाला। इस हिसाब से वोटिंग का आंकड़ा 97.92 फीसदी रहा।
बैंक की सत्ता किसके हाथ आएगी, इसे लेकर राजनीतिक खींचतान काफी दिनों से चल रही थी। बारह सीटों के लिए 28 उम्मीदवार मैदान में थे और अब उन सबकी किस्मत मतपेटियों में बंद है। मतगणना 3 नवंबर को होगी और उसी से जिले की सहकारी राजनीति की अगली दिशा तय होगी।
चुनाव शुरू से ही प्रतिष्ठा की लड़ाई बना हुआ था। महायुति के भीतर के समीकरण, नेताओं का शक्ति प्रदर्शन और स्थानीय स्तर की राजनीतिक रस्साकशी, इन सबकी वजह से मुकाबला काफी कांटे का हो गया। वोटिंग वाले दिन भी हर एक वोट के लिए नेताओं की टीमें सक्रिय रहीं। खास तौर पर कराड, पाटण, माण, महाबलेश्वर और फलटण की लड़ाइयों ने माहौल गरम रखा।
तहसीलवार आंकड़ों में पाटण 98.99 फीसदी के साथ सबसे आगे रहा। सातारा में 98.73 और कराड में 98.21 फीसदी वोटिंग हुई। कोरेगांव, खंडाळा और वाई तहसीलों में सौ फीसदी वोट पड़े। जावली में 94.20, महाबलेश्वर में 90.20, खटाव में 96.66, माण में 96.74 और फलटण में 96.19 फीसदी वोटिंग दर्ज हुई। कुल मतदाताओं में 1 हजार 818 पुरुष और 161 महिलाएं शामिल हैं।
सातारा के आईटीआई केंद्र पर सांसद उदयनराजे भोसले और सार्वजनिक निर्माण मंत्री शिवेंद्रसिंहराजे भोसले ने वोट डाला। भाजपा की कोर टीम की मौजूदगी भी लोगों की नजर में रही। शिवेंद्रसिंहराजे खुद उम्मीदवार नहीं हैं, फिर भी चुनाव की योजना और राजनीतिक मोर्चाबंदी में उनकी भूमिका अहम रही। उन्होंने सातारा और मेढा जाकर वोटिंग की प्रक्रिया का जायजा भी लिया।
इतनी ज्यादा वोटिंग का मतलब क्या निकाला जाए, इस पर अब अटकलें चल रही हैं। कोई इसे सत्ताधारी गुट का समर्थन मान रहा है, तो कोई कह रहा है कि यह पुराने जमे हुए नेताओं से नाराजगी हो सकती है। जिन तहसीलों में सौ फीसदी वोट पड़े, वहां का रुझान किसके पक्ष में जाएगा, इसकी उत्सुकता है। कराड और पाटण की प्रतिष्ठा वाली लड़ाइयां और माण व महाबलेश्वर में वोटों का बंटवारा नतीजों का गणित बदल सकता है।
वोटिंग प्रतिशत बढ़ने भर से जीत पक्की मान लेना किसी भी गुट के लिए ठीक नहीं होगा। 3 नवंबर को मतपेटियां खुलने के बाद ही साफ होगा कि नेताओं के शक्ति प्रदर्शन का असली हिसाब क्या रहा। जिला बैंक की सत्ता का ताज किसके सिर सजेगा, इस पर पूरे जिले की नजर टिकी है।
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