रावण की पीड़ा से निकला शिव तांडव स्तोत्र, कैलास पर्वत से जुड़ी है इसकी कथा
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पौराणिक कथाओं के मुताबिक लंकाधिपति रावण ने शिव तांडव स्तोत्र रचा था। इसमें 17 श्लोक हैं और महादेव के तांडव नृत्य का वर्णन है।
पौराणिक कथाओं में बताया जाता है कि शिव तांडव स्तोत्र की रचना लंकाधिपति रावण ने की थी। इस स्तोत्र में महादेव के तांडव नृत्य, उनकी जटाओं से बहती गंगा और गले में लिपटे सर्प का वर्णन मिलता है। इसके पीछे कैलास पर्वत से जुड़ी एक कथा भी सुनाई जाती है।
कथा के मुताबिक रावण महादेव का परम भक्त था। एक बार उसे अपनी ताकत का बहुत घमंड हो गया। वह महादेव को प्रसन्न करके पूरा कैलास पर्वत ही लंका ले जाने निकल पड़ा। जैसे ही उसने कैलास को अपने हाथों पर उठाने की कोशिश की, पूरा पर्वत हिल उठा।
इससे पार्वती माता डर गईं। तब भगवान शिव ने रावण का घमंड तोड़ने के लिए अपने पैर का अंगूठा कैलास पर्वत पर हल्के से दबा दिया। रावण के हाथ (उंगलियां) पर्वत के नीचे दब गए और वह दर्द से कराहने लगा। उसी तेज दर्द में और शिवभक्ति के असर से रावण के मुंह से अचानक संस्कृत में बेहद ऊंचे दर्जे के शब्द फूट पड़े। महादेव का गुस्सा शांत करने और उनसे माफी मांगने के लिए रावण ने जो स्तुतिगीत गाया, उसी को शिव तांडव स्तोत्र कहा जाता है। कथा कहती है कि उसकी इस बेमिसाल भक्ति से खुश होकर शिव ने उसे छोड़ दिया।
स्तोत्र में महादेव के तांडव नृत्य, उनकी जटाओं, गले के सर्पों और उनके उग्र व सुंदर रूप का अद्भुत वर्णन है। शिव की घनी जटाओं रूपी जंगल से गंगा की पवित्र धारा खलखलाती बहती दिख रही है और उनके गले में लंबा भुजंग (सांप) माला की तरह लटक रहा है। महादेव "डमड डमड" की आवाज में डमरू बजाते हुए प्रचंड तांडव कर रहे हैं। उनके विशाल माथे पर आग धधक रही है और मस्तक पर बालचंद्र (चंद्रकला) गहने की तरह सजा है। स्तोत्र में शिव को कामदेव को भस्म करने वाले, अंधकासुर और त्रिपुरासुर का वध करने वाले और काल यानी मृत्यु पर भी जीत पाने वाले परमेश्वर के रूप में बताया गया है।
स्तोत्र के उत्तरार्ध में रावण यह इच्छा जताता है, "मेरा मन कब स्थिर होगा? जब मैं पत्थर और सोने में, दुश्मन और दोस्त में, तिनके और कमलनयनी स्त्री में कोई फर्क किए बिना समभाव से महादेव की भक्ति करूंगा।"
शिव तांडव स्तोत्र में कुल 17 श्लोक (पद) हैं। पहले 14 श्लोक स्तोत्र का मुख्य हिस्सा हैं। इनमें महादेव के रूप, तांडव नृत्य और उनकी शक्ति की "निष्काम स्तुति" की गई है। इसी वजह से आम तौर पर पाठ करते या गाते वक्त मुख्य रूप से यही पहले 14 श्लोक गाए जाते हैं।
आखिरी 3 श्लोक (15 से 17) "फलश्रुति" कहलाते हैं। इनमें इस स्तोत्र के पाठ का महत्व और उसका तरीका बताया गया है। साथ ही यह भी कि इसे गाने से इंसान को रथ, हाथी, घोड़े (यानी सुख और समृद्धि) और स्थिर लक्ष्मी कैसे मिलती है।
साहित्य की नजर से देखें तो यह स्तोत्र संस्कृत के "पंचचामर छंद" में रचा गया है, जिसमें हर पंक्ति में 16 अक्षर होते हैं। स्तोत्र के शब्दों की बनावट (जैसे जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले) और तुकबंदी का ढंग ऐसा है कि इसे बोलते वक्त एक तरह की अंदरूनी ऊर्जा और रफ्तार पैदा होती है। यह स्तोत्र सिर्फ एक स्तुति नहीं है। यह महादेव की सामर्थ्य, उनके रूप और उनके अलौकिक तांडव नृत्य का बहुत सुंदर और लयबद्ध वर्णन है।
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