फुटाला फव्वारे की आवाज़ सुधारेंगे ऑस्कर विजेता रेसुल पुकुट्टी, अगले हफ्ते नागपुर आएंगे
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
फुटाला का म्यूज़िकल फव्वारा फिर चालू होने की तैयारी में है। ऑस्कर विजेता साउंड डिज़ाइनर रेसुल पुकुट्टी अगले हफ्ते नागपुर आकर ऑडियो कैलिब्रेशन करेंगे।
फुटाला का म्यूज़िकल फव्वारा दोबारा शुरू होने की तैयारी में है और इसका आखिरी काम ऐसा है जो दिखेगा नहीं, लेकिन सुनाई ज़रूर देगा। ऑस्कर विजेता साउंड डिज़ाइनर रेसुल पुकुट्टी अगले हफ्ते नागपुर आने वाले हैं। वे यहां खास ऑडियो कैलिब्रेशन करेंगे, ताकि व्यूइंग गैलरी में दर्शक कहीं भी बैठे हों या चलते हुए कहीं भी पहुंचें, उन्हें एक जैसी साफ और डूबो देने वाली आवाज़ मिले।
मरम्मत का काम अब अहम तकनीकी दौर में पहुंच गया है। अब ज़ोर सिर्फ फव्वारे को चालू करने पर नहीं, बल्कि पूरा ऑडियो-विज़ुअल अनुभव तैयार करने पर है। चुनौती यह है कि संगीत, पानी की चाल और लाइटिंग आपस में पूरी तरह तालमेल में चलें और इस बड़े खुले परिसर में हर जगह आवाज़ की क्वालिटी एक जैसी रहे।
एमी अवॉर्ड विजेता सिनेमैटोग्राफर और फुटाला के टेक्निकल डायरेक्टर अल्फोंस रॉय ने बताया कि पुकुट्टी का काम आम साउंड इंजीनियरिंग से आगे का है। उन्हें गैलरी में ऑडियो के स्तर का फर्क खत्म करना है, ताकि एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने पर दर्शकों को संगीत कभी तेज और कभी धीमा न लगे।
फुटाला के लिए बदला गया डॉल्बी एल्गोरिदम
पुकुट्टी बड़े पैमाने के मनोरंजन इंस्टॉलेशन में इस्तेमाल होने वाली साउंड इंजीनियरिंग तकनीकें समझने लास वेगास गए थे। वहां के अवलोकन और फुटाला की अपनी अलग ध्वनि ज़रूरतों के आधार पर उन्होंने डॉल्बी से संपर्क किया और अपने एल्गोरिदम में खास बदलाव करने को कहा, ताकि वह फव्वारे के खुले माहौल में ठीक बैठे। मकसद बड़ा है: पूरे व्यूइंग एरिया में आवाज़ की वॉल्यूम और क्लैरिटी में बिना किसी खास उतार-चढ़ाव के एक जैसी कवरेज।
आम ऑडिटोरियम के उलट फुटाला में न दीवारें हैं, न छत, जो आवाज़ को समेटकर रखें। हवा का बहाव, मौसम, स्पीकर कहां लगे हैं और आवाज़ के स्रोत से दर्शकों की अलग-अलग दूरी, इन सबसे ध्वनि का संतुलन बनाना काफी मुश्किल हो जाता है। इसलिए साउंड सिस्टम को ऐसे तैयार करना होगा कि वह इन माहौल की दिक्कतों पर काबू पाए, न कि बंद हॉल की कुदरती गूंज के भरोसे रहे।
पानी, रोशनी और संगीत का तालमेल
उधर, इस महीने आधिकारिक तकनीकी कामकाज शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय तकनीकी टीम ने फव्वारे के मल्टीमीडिया सिस्टम की प्रोग्रामिंग शुरू कर दी है। प्रोग्रामिंग पूरी होने पर ऑडियो ट्यूनिंग होगी, फिर पानी की धारों, लाइटिंग इफेक्ट और संगीत को आपस में मिलाया जाएगा। पूरी प्रक्रिया में करीब एक महीना लगने की उम्मीद है।
प्रोग्रामिंग का दौर इसलिए अहम है कि इसी से तय होता है कि फव्वारे के मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़े ऑडियो-विज़ुअल क्रम पर कैसे चलेंगे। पानी की हर हरकत और रोशनी का हर बदलाव संगीत से ठीक मेल खाना चाहिए। पिछले रविवार को कुछ मिनट के लिए नारंगी रोशनी के बीच पानी की धाराएं ऊपर उठीं, जिससे मरम्मत की प्रगति की उम्मीद भरी झलक मिली।
बेल्जियम के विशेषज्ञ Basile de Schrynmakers, निकोलस और अंतरराष्ट्रीय टीम के दूसरे सदस्य फिलहाल नागपुर में हैं और आखिरी तैयारियों की निगरानी कर रहे हैं। महामेट्रो के अधिकारियों को दिसंबर के पहले हफ्ते तक तकनीकी तैयारी पूरी होने की उम्मीद है। लेकिन तकनीकी काम पूरा होने को आम शो शुरू होने से नहीं जोड़ना चाहिए, क्योंकि जनता के लिए शो ज़रूरी मंज़ूरियों और औपचारिक उद्घाटन के इंतज़ाम पर निर्भर करेंगे।
फुटाला के लिए मरम्मत की असली कसौटी सिर्फ पानी की ऊंचाई या रोशनी की चमक नहीं होगी, बल्कि यह होगी कि पूरा नज़ारा एक सटीक प्रस्तुति की तरह एक साथ टिक पाता है या नहीं। पुकुट्टी की ऑडियो महारत आखिरी दौर में जुड़ने से फुटाला अपने म्यूज़िकल फव्वारे को ऐसा अनुभव बनाना चाहता है जहां आवाज़ बराबर फैले, रोशनी साथ-साथ बदले और पानी ताल पर नाचे। यानी नागपुर का यह मशहूर फव्वारा इस बार आंखों के साथ कानों को भी खास अनुभव देने की तैयारी में है।
कमेंट
अभी कोई कमेंट नहीं। पहले आप लिखिए।