मंगलवार, 3 नवंबर 2026

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धनत्रयोदशी पर सोना खरीदना जरूरी नहीं, पीतल-तांबे के बर्तन और धनिया भी शुभ

धनत्रयोदशी पर सोना खरीदना जरूरी नहीं, पीतल-तांबे के बर्तन और धनिया भी शुभ तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

धर्मशास्त्र के हवाले से बताया गया है कि धनत्रयोदशी पर सोना खरीदना अच्छा माना जाता है, पर ज़रूरी नहीं। बजट न हो तो और भी चीजें शुभ मानी गई हैं।

धनत्रयोदशी (धन्वंतरी जयंती) का हिंदू धर्मशास्त्र और भारतीय संस्कृति में बड़ा स्थान है। इस दिन नई चीज खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। कई लोग समझते हैं कि इस दिन सिर्फ सोना या चांदी ही खरीदनी चाहिए। सवाल यह है कि क्या सोना खरीदना सच में बाध्यकारी है और अगर सोना न खरीद सकें तो क्या लिया जाए।

धर्मशास्त्र के मुताबिक धनत्रयोदशी पर सोना खरीदना अच्छा माना जाता है, लेकिन यह अनिवार्य या बाध्यकारी बिल्कुल नहीं है। धर्मशास्त्र में 'धन' का मतलब सिर्फ पैसा या सोना-चांदी नहीं है। सेहत, समृद्धि, अनाज और संतोष भी धन का ही हिस्सा हैं। इसलिए अपनी आर्थिक हैसियत से बाहर जाकर, कर्ज लेकर या मन पर बोझ रखकर सोना खरीदने की जरूरत नहीं है। यहां श्रद्धा और खुशी की अहमियत है, चीज की कीमत की नहीं।

अगर सोना खरीदने का मन न हो या बजट न हो, तो धर्मशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र के अनुसार नीचे बताई चीजें बेहद शुभ और फलदायी मानी जाती हैं।

सबसे पहले पीतल या तांबे के बर्तन। धनत्रयोदशी मुख्य रूप से भगवान धन्वंतरी, यानी आरोग्य के देवता, के प्रकट होने का दिन है। समुद्रमंथन से जब वे प्रकट हुए, तो उनके हाथ में अमृत से भरा पीतल का कलश था। इसी वजह से इस दिन पीतल (Brass) या तांबे (Copper) का बर्तन या पानी का कलश खरीदना सोने जितना ही शुभ माना जाता है।

सोना महंगा लगे तो चांदी का छोटा सिक्का, चांदी का दीया या चम्मच लिया जा सकता है। चांदी को पवित्र और मन को शांति देने वाली धातु माना गया है।

साबुत धनिया खरीदने की भी पुरानी परंपरा है। धनिया समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। थोड़ा साबुत धनिया लेकर दिवाली की पूजा में लक्ष्मी माता के सामने रखा जाता है। भाईदूज के बाद इसे घर के गमले या बगीचे में बो दिया जाता है। मान्यता है कि जैसे धनिए के पौधे बढ़ते हैं, वैसे ही घर की समृद्धि बढ़ती है।

लक्ष्मी पूजन और नैवेद्य के लिए मिश्री, बताशे या खील खरीदना भी शुभ बताया गया है। झाड़ू को 'लक्ष्मी' का रूप माना जाता है और कहा जाता है कि वह घर से दरिद्रता और नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालती है। धनत्रयोदशी पर नई झाड़ू खरीदकर उसकी पूजा की जाती है, जिससे घर में स्वच्छता और सकारात्मकता रहती है। दिवाली की पूजा के लिए मिट्टी के दीये, दीपक और लक्ष्मी-गणेश की नई मूर्ति या फोटो भी इसी दिन खरीदने को कहा गया है।

समुद्रमंथन से वैद्यराज धन्वंतरी प्रकट हुए, इसलिए इस दिन आरोग्य की प्रार्थना की जाती है। शास्त्र कहता है कि 'पहला सुख निरोगी काया', यानी अच्छी सेहत ही सबसे बड़ा धन है। शाम को घर के बाहर यमराज के लिए दक्षिण की तरफ मुंह करके दीया जलाया जाता है, जिसे यमदीपदान कहते हैं। शास्त्र के अनुसार इससे परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।

इससे जुड़ी पौराणिक कथा यह है कि राजा हेमा के बेटे को शाप था कि शादी के चौथे दिन सांप के काटने से उसकी मौत होगी। उसकी पत्नी ने विवाह के चौथे दिन की रात महल में सोने-सिक्कों के ढेर लगाए और चारों तरफ दीये जला दिए। दीयों की जगमगाहट और सोने की चमक से सर्प के वेश में आए यमराज की आंखें चौंधिया गईं और वे अंदर नहीं जा सके। इस तरह राजकुमार के प्राण बच गए। तभी से इस दिन दीये जलाने और यमपूजन की प्रथा शुरू हुई।

(धर्म, ज्योतिष, वास्तु, फेंगशुई जैसे विषयों के लेख पाठकों की जानकारी के लिए हैं। इनसे जुड़ा कोई भी प्रयोग करने से पहले जानकारों की सलाह जरूरी है।)

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