राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज की 58वीं पुण्यतिथि: खंजिरी भजन से गांव और समाज को जगाया
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तिथि के हिसाब से 30 अक्टूबर को राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज की 58वीं पुण्यतिथि मनाई जाती है। खंजिरी भजन और ग्रामगीता के जरिए उन्होंने आम लोगों तक समाज सुधार और ग्रामविकास का संदेश पहुंचाया।
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज की 58वीं पुण्यतिथि तिथि के हिसाब से 30 अक्टूबर को मनाई जाती है। वे महाराष्ट्र की संत परंपरा के बड़े संत, समाज सुधारक, राष्ट्रप्रेमी और ग्रामविकास के असरदार विचारक थे। अध्यात्म और समाजकार्य को साथ जोड़कर उन्होंने आम आदमी की जिंदगी में बदलाव लाने की कोशिश की।
भजन, कीर्तन, गांव की सफाई, शिक्षा, नशामुक्ति और राष्ट्रीय एकता, इन सबके जरिए उन्होंने समाज को जगाया। उनका पूरा जीवन राष्ट्रसेवा, मानवता और सामाजिक समता के विचारों को समर्पित रहा।
तुकडोजी महाराज का जन्म 29 अप्रैल 1909 को अमरावती जिले के यावली गांव में हुआ था। उनका असली नाम माणिक बंडोजी इंगळे था। बचपन से ही उन्हें अध्यात्म, भजन और चिंतन का शौक था। संत परंपरा के विचारों का असर उनकी जिंदगी पर पड़ा, और आगे चलकर उन्होंने अपनी आध्यात्मिक साधना के साथ समाजसेवा को भी जोड़ लिया।
उनके लिए अध्यात्म सिर्फ ईश्वर की भक्ति नहीं था। वह इंसान की जिंदगी में अच्छा बदलाव लाने का जरिया था। समाज में फैली अंधश्रद्धा, जातिभेद, अज्ञान और बुरी रूढ़ियों को दूर करने के लिए उन्होंने अपने विचारों और अपनी वाणी का असरदार इस्तेमाल किया।
खंजिरी भजन उनके काम की खास पहचान था। खंजिरी की ताल पर गाए जाने वाले उनके भजनों में अध्यात्म के साथ समाज की हकीकत भी दिखती थी। उनकी भाषा सीधी, बहती हुई और आम आदमी को आसानी से समझ आने वाली थी। इसी वजह से उनके विचार गांवों के आम लोगों तक पहुंचे। उनका कहना था कि हर इंसान को अपनी तरक्की के साथ गांव और देश के विकास में भी योगदान देना चाहिए। उनके भजनों से कई लोगों को समाजकार्य की प्रेरणा मिली।
उनके विचारों का सबसे अहम ग्रंथ ग्रामगीता है। इस ग्रंथ की मुख्य बात यह है कि भारत के सब तरफ के विकास के लिए गांव की जिंदगी का विकास जरूरी है। भारत गांवों का देश है, इसलिए गांव आगे बढ़े बिना देश की तरक्की पूरी नहीं हो सकती, ऐसा वे मानते थे। उनकी अपेक्षा थी कि गांव साफ, संगठित, पढ़ा-लिखा, आत्मनिर्भर और नशामुक्त हो।
उन्होंने नौजवानों से खास तौर पर राष्ट्रसेवा और समाजसेवा की ओर मुड़ने की अपील की। मेहनत को इज्जत देना, सबके भले के लिए काम करना और समाज के कमजोर तबके की मदद करना, इन मूल्यों का उन्होंने प्रचार किया।
वे अध्यात्म के साधक होने के साथ तीखे राष्ट्रभक्त भी थे। आजादी की लड़ाई के दौर में उन्होंने अपने भजनों और भाषणों से लोगों में राष्ट्रीय जागृति पैदा की। आजादी, स्वाभिमान और सामाजिक जिम्मेदारी की अहमियत उन्होंने लोगों को समझाई। उनके राष्ट्रकार्य को देखते हुए देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें राष्ट्रसंत की उपाधि दी, ऐसे उल्लेख मिलते हैं। इस उपाधि से उनके समाजप्रबोधन के काम को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली।
उनका काम भारत तक सीमित नहीं था। 1955 में जापान में हुई विश्वधर्म और विश्वशांति परिषद में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। इससे उन्हें भारतीय अध्यात्म, शांति और मानवकल्याण का संदेश दुनिया तक पहुंचाने का मौका मिला।
11 अक्टूबर 1968 को अमरावती जिले के गुरुकुंज आश्रम, मोझरी में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का महानिर्वाण हुआ। फिर भी उनके विचारों और काम का असर आज भी कायम है। ग्रामगीता, उनके भजन और समाजसेवा की प्रेरणा के जरिए उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच रही है।
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