फटाकों का शोर तो घटा, पर ग्रीन क्रैकर्स में भी मिल रहे बैन केमिकल
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
आवाज फाउंडेशन का कहना है कि फटाकों की आवाज अब ज्यादातर कानूनी हद में है, मगर जहरीले केमिकल का खतरा बना हुआ है।
मुंबई में फटाकों के कान फाड़ देने वाले शोर पर काबू पाने की कोशिशें पिछले दो दशक से चल रही हैं, और अब इनका असर दिखने लगा है। पहले जो फटाके 140 डेसिबल से ज्यादा आवाज करते थे, वे अब ज्यादातर मौकों पर 125 डेसिबल की कानूनी हद के अंदर आ गए हैं। लेकिन आवाज कम होने का मतलब यह नहीं कि खतरा टल गया। आवाज फाउंडेशन ने चेताया है कि फटाकों से निकलने वाले जहरीले केमिकल का गंभीर खतरा अब भी बना हुआ है।
फाउंडेशन ने महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के साथ मिलकर 8 सितंबर को वडाला ट्रक टर्मिनस पर 21 तरह के फटाकों की जांच की थी। उस वक्त सभी फटाकों ने आवाज की तय हद पार कर दी थी। सबसे ज्यादा आवाज 144.9 डेसिबल दर्ज की गई थी। इसके बाद हर साल नियमित जांच होती रही और जागरूकता अभियान चलाए गए। इससे फटाके बनाने वालों पर कम आवाज वाले फटाके तैयार करने का दबाव बना। नतीजा यह हुआ कि फटाकों की आवाज कानूनी हद में लाने में कामयाबी मिली।
आवाज काबू में आई तो केमिकल से होने वाला प्रदूषण ज्यादा साफ तौर पर सामने आया। संस्था ने 10 नवंबर 2012 से मुंबई के बाजारों में बिक रहे फटाकों में मौजूद केमिकल और भारी धातुओं की जांच शुरू की थी। करीब 15 साल की इस जांच में पता चला है कि बेरियम जैसे बैन किए गए खतरनाक केमिकल का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बाजार में ग्रीन क्रैकर्स यानी हरित फटाके बताकर बेचे जा रहे पैकेटों में भी ये जहरीले केमिकल मिले हैं। संस्था ने यह भी देखा कि कई पैकेटों पर छपा क्यूआर कोड नकली है।
संस्था ने साफ कहा है कि सिर्फ आवाज कम होने से कोई फटाका पर्यावरण के लिए सुरक्षित नहीं हो जाता। इसलिए लोगों से अपील की गई है कि फटाके खरीदते समय पैकेट पर लिखी चीजों की जानकारी ध्यान से पढ़ें। क्यूआर कोड असली है या नहीं, यह भी जांच लें। और पूरी तसल्ली कर लें कि फटाके सचमुच ग्रीन क्रैकर्स हैं, तभी खरीदें।
शोर के प्रदूषण पर काबू पाने के बाद अब केमिकल प्रदूषण को रोकना संबंधित एजेंसियों के सामने नई चुनौती बनकर खड़ा है।
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