पेशाब के सैंपल से पकड़ में आ सकता है ब्लैडर कैंसर, RNA पर टिकी नई जांच से जगी उम्मीद
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रिसर्चरों की नई जांच पेशाब में मौजूद RNA अणुओं को परखती है। शुरुआती स्टेज के मरीज भी पकड़ में आए, पर तकनीक अभी प्राथमिक रिसर्च के दौर में है।
ब्लैडर यानी मूत्राशय के कैंसर का पता अब सिर्फ पेशाब के सैंपल की जांच से लग सकेगा, ऐसी उम्मीद जगी है। रिसर्चरों ने एक नई जांच तैयार की है, जो पेशाब में मौजूद RNA अणुओं का विश्लेषण करती है। इसी जांच के जरिए ब्लैडर कैंसर की पहचान करने में रिसर्चरों को कामयाबी मिली है।
खास बात यह है कि कैंसर की शुरुआती स्टेज वाले मरीजों को पकड़ने में भी यह जांच असरदार साबित हुई। यह रिसर्च वैज्ञानिक पत्रिका नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुई है।
अभी कैंसर की पहचान के लिए जो लिक्विड बायोप्सी जांचें इस्तेमाल होती हैं, उनमें ज्यादातर खून में कैंसर की कोशिकाओं से निकलने वाले DNA का अध्ययन किया जाता है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर मैक्सिमिलियन डायन और उनके साथियों ने इससे अलग रास्ता चुना। उन्होंने DNA से जुड़े RNA अणुओं के विश्लेषण पर जोर दिया। रिसर्चरों के मुताबिक RNA से यह जानकारी मिल सकती है कि शरीर में कौन से जीन सक्रिय हैं और कैंसर की कोशिकाओं में असल में क्या बदलाव हो रहे हैं।
इस रिसर्च के लिए कैंसर से पीड़ित और स्वस्थ, दोनों तरह के कुल 515 लोगों के नमूनों की जांच की गई। इनमें नई तकनीक ने ब्लैडर कैंसर की पहचान के मामले में हर 100 मरीजों में से 95 को पकड़ लिया। जांच से सुरुआती अवस्था के कैंसर के संकेत भी मिले।
इसके अलावा रिसर्चरों का कहना है कि इस जांच से कैंसर के प्रकार और उसके दोबारा उभरने के खतरे के बारे में भी अहम जानकारी मिल सकती है। उनकी राय में पेशाब सीधे ब्लैडर की गांठों के संपर्क में आता है, इसलिए कैंसर की पहचान के लिए वह काम की साबित हो सकता है।
अब रिसर्चर यह देख रहे हैं कि क्या इसी तकनीक से किडनी और प्रोस्टेट के कैंसर की पहचान भी की जा सकती है। इस पर अध्ययन चल रहा है। रिसर्चरों ने आगे चलकर पेशाब की एक ही जांच से मूत्रमार्ग से जुड़े कई तरह के कैंसर पकड़ने की संभावना जताई है।
हालांकि यह तकनीक अभी प्राथमिक रिसर्च के दौर में ही है। नियमित कैंसर जांच में इसका इस्तेमाल शुरू करने से पहले और बड़े पैमाने पर रिसर्च और मेडिकल ट्रायल जरूरी हैं। कम तकलीफ वाले और अपेक्षाकृत आसान तरीके से कैंसर की जल्दी पहचान की दिशा में इस रिसर्च को एक अहम कदम माना जा रहा है।
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