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नकली उल्लू और शिकारी आवाजों से नहीं डरे पक्षी, कनाडा की पवन ऊर्जा स्टडी में खुलासा

कनाडा के नोवा स्कोशिया में हुई रिसर्च में पवनचक्की के पास नकली उल्लू और शिकारी पक्षी की आवाज का पक्षियों पर कोई खास असर नहीं दिखा।

नकली उल्लू और शिकारी आवाजों से नहीं डरे पक्षी, कनाडा की पवन ऊर्जा स्टडी में खुलासा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

पवन ऊर्जा से साफ-सुथरी बिजली तो बनती है, लेकिन दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही इन विशाल पवनचक्कियों से पक्षियों की जान को भी खतरा है। ऊंचाई पर तेजी से घूमते टर्बाइन के पंखों से टकराकर हर साल हजारों दुर्लभ और स्थानीय पक्षी मर जाते हैं।

इसका हल निकालने के लिए कई पवन ऊर्जा कंपनियां और पर्यावरण से जुड़े लोग पक्षियों को डराकर दूर रखने के पुराने तरीके आजमाते हैं। इनमें नकली उल्लू के पुतले, पंख फड़फड़ाने वाले मॉडल और शिकारी जानवरों की रिकॉर्ड की हुई आवाजें बजाना शामिल है। सवाल यह है कि ये तरीके सच में काम करते हैं या यह सिर्फ एक गलतफहमी है। कनाडा के रिसर्चरों की एक गहरी स्टडी ने इस सवाल का जवाब दिया है और इस क्षेत्र के लोग चौंक गए हैं।

कनाडा के नोवा स्कोशिया में कैथरीन डोर (Catherine Doucette), स्कॉट डिकी (Scott Dickey) और टोनी आर. वॉकर (Tony R. Walker) ने पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट के पास पक्षी भगाने वाले उपायों को असल में परखा। उनकी यह रिसर्च 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द नोवा स्कोशियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस' (Proceedings of the Nova Scotian Institute of Science) नाम की वैज्ञानिक पत्रिका में छपी है। नतीजा साफ था: चाहे नकली उल्लू का मॉडल हो या शिकारी जानवरों की डरावनी आवाजें, कोई भी पक्षियों को टर्बाइन वाले इलाके से दूर नहीं रख सका।

यह फील्डवर्क 22 अगस्त से 16 सितंबर 2016 के बीच हुआ। जगह थी कनाडा के हैलिफैक्स से 20 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में बना पांच टर्बाइन वाला एक पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट। मकसद यह देखना था कि नजर आने वाले और सुनाई देने वाले संकेतों से पक्षियों का बर्ताव बदला जा सकता है या नहीं, और क्या उन्हें पवनचक्कियों के खतरे वाले दायरे से दूर रखा जा सकता है।

दो तरह के उपकरण टेस्ट किए गए। पहला था 'बर्ड-एक्स प्रोवलर आउल' (Bird-X Prowler Owl) नाम का नकली उल्लू, जिसके पंख हवा के जोर से फड़फड़ाते हैं। इसे टर्बाइन से सिर्फ 50 मीटर की दूरी पर लगाया गया, ताकि पक्षियों को लगे कि वहां कोई बड़ा शिकारी पक्षी बैठा है। दूसरे उपकरण में साउंड सिस्टम था, जिस पर 'रेड-टेल्ड हॉक' (Red-tailed Hawk) की आवाज के साथ 'ओवनबर्ड' (Ovenbird) और 'व्हाइट-थ्रोटेड स्पैरो' (White-throated Sparrow) की खतरे की चेतावनी वाली आवाजों का मिक्स बजाया गया।

रिसर्चरों ने उपकरण लगे होने और न लगे होने, दोनों हालात में पक्षियों की आवाजाही की बारीकी से तुलना की। यह जरूरी था, क्योंकि खाने की उपलब्धता, मौसम या सीजन जैसी कुदरती वजहों से भी पक्षी अपनी जगह बदल सकते हैं। चार हालात की तुलना की गई: सिर्फ उल्लू का मॉडल, उल्लू के मॉडल के साथ खतरनाक आवाजें, एक चलता हुआ टर्बाइन और एक बंद खड़ा टर्बाइन।

कंट्रोल साइट से तुलना करने पर पता चला कि नकली उल्लू और शिकारी पक्षियों की आवाजें, दोनों का पक्षियों की मौजूदगी या उनके उड़ान के रास्ते पर कोई खास असर नहीं पड़ा। पक्षी इन उपकरणों को अनदेखा करके हमेशा की तरह टर्बाइन के आसपास घूमते रहे। यानी ऐसे सीधे-सादे और पुराने उपाय पक्षियों को टर्बाइन वाले इलाके में आने से रोकते ही नहीं।

पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट चलाने वालों और वन्यजीव संरक्षण संस्थाओं के लिए यह स्टडी आंख खोलने वाली है। बाजार में मिलने वाले पक्षी भगाने के उपाय अक्सर बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन इस रिसर्च के मुताबिक असल में उनका असर शून्य रहा। जब पक्षी इन चीजों से डरते ही नहीं, तो टर्बाइन से टकराने या पक्षियों के मरने की घटनाएं कम होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

कुछ जानकारों का कहना है कि अलग डिजाइन के पुतले या आवाजों का अलग मेल शायद अलग नतीजा दे सकता है। फिर भी अभी जो उपाय मौजूद हैं, उनमें से ज्यादातर बेकार साबित हो रहे हैं। इसलिए पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट चलाने वालों को सिर्फ कागजी उपायों पर टिके रहने के बजाय पक्षियों की हिफाजत के लिए ज्यादा ठोस, वैज्ञानिक और नई तकनीक अपनानी होगी। रडार पर चलने वाले टर्बाइन शटडाउन सिस्टम (Radar-based shut-down systems) या एआई कैमरे (AI Camera Detection) जैसे आधुनिक विकल्पों पर जोर देना अब वक्त की जरूरत है।

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