परभणी की सत्यभामा देशमाने बनीं सौ बच्चों की दादी, किसानों के बच्चों को दिया सहारा
परभणी जिले के मंगरूळ की सत्यभामा देशमाने आत्महत्या कर चुके किसानों के बच्चों की देखभाल करती हैं।
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नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा होती है। संकटों से लड़ने की ताकत, ममता की गर्मी और त्याग की सीख देने वाले इन रूपों की झलक कुछ लोगों की जिंदगी में भी दिखती है। परभणी जिले के मानवत तालुका के मंगरूल गांव की सत्यभामा बाबाराव देशमाने ऐसी ही एक शख्सियत हैं।
सत्यभामा और उनके पति बाबाराव तीर्थयात्री दंपति हैं। घर की हालत बहुत तंग थी। हफ्ते का बाजार सिर्फ दस रुपये में करना पड़ता था। चूल्हा जलाने के लिए पड़ोस के घर से आग मांगकर लानी पड़ती थी। बाबाराव खेती के काम के साथ रात देर तक कंदील की रोशनी में कपड़े सिलते थे। गरीबी बेटे की पढ़ाई के आड़े न आए, इसलिए दोनों ने जी-तोड़ मेहनत की। उनका इकलौता बेटा अशोक सॉफ्टवेयर इंजीनियर बना और पुणे में नौकरी करने लगा।
फिर अशोक ने 26 साल की उम्र में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ने का फैसला किया। वजह थी आत्महत्या कर चुके किसानों के बच्चों को पढ़ाई और अच्छी परवरिश दिलाना। बाबा आमटे के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने 'स्नेहवन' नाम की सामाजिक परियोजना शुरू की। शुरू में सत्यभामा और बाबाराव को बेटे के भविष्य की चिंता हुई, लेकिन आखिर में दोनों ने उसके सपने का साथ देने की ठानी। वे गांव की खेती और घर छोड़कर पुणे आ गए और इन बच्चों के दादी-दादा बन गए।
शुरुआत में सत्यभामा अकेली 20 बच्चों का खाना बनाती थीं। बच्चे बीमार पड़ते तो रात-रात भर जागकर उनकी देखभाल करती थीं। खाने-पीने से लेकर भावनात्मक सहारे तक, हर बात में वे बच्चों के साथ खड़ी रहीं। आज वे स्नेहवन के भोजनालय की जिम्मेदारी संभालती हैं। बाबाराव बच्चों को गायन और मृदंग सिखाते हैं। लकवे से उबरने के बाद भी वे गोशाला का काम देखते हैं, ताकि बच्चों को अच्छा दूध मिल सके। अशोक और उनकी पत्नी अर्चना भी बच्चों के भविष्य के लिए दिन-रात लगे रहते हैं।
20 बच्चों की मां बनीं सत्यभामा आज सौ बच्चों की दादी हैं और सब पर ममता की छांव रखती हैं। उन्हें इंद्रायणी थडी, राजमाता जिजाऊ, आदर्श माता-पिता और ज्ञानप्रबोधिनी के राधामाता पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। पंढरी की यात्रा करने वाले इस दंपति ने बच्चों की सेवा के लिए अपनी यात्रा रोक दी। फिर भी सौ बच्चों के रूप में उनकी जिंदगी में भक्ति की एक नई राह खुल गई। अपनी ममता को सिर्फ अपने बेटे तक सीमित न रखकर कई बच्चों को सहारा देने वाली सत्यभामा देशमाने में ही नवदुर्गा की ममता और त्याग की झलक मिलती है।