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06:07 IST

शारदीय नवरात्र 11 से 19 अक्टूबर तक, हर दिन का अलग रंग तय

इस साल घटस्थापना 11 अक्टूबर 2026 को है। नौ दिनों के नौ रंग और देवी के नौ रूपों की पूरी सूची।

शारदीय नवरात्र 11 से 19 अक्टूबर तक, हर दिन का अलग रंग तय तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

महाराष्ट्र समेत पूरे देश में शारदीय नवरात्र उत्साह और भक्तिभाव से मनाया जाता है। इसे आदिशक्ति के नौ रूपों की उपासना का पर्वकाल माना जाता है। नौ दिन चलने वाले इस उत्सव में देवी के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। हर दिन के लिए एक खास रंग तय रहता है और श्रद्धालु उसी रंग के कपड़े पहनकर उत्सव में शामिल होते हैं।

इस साल घटस्थापना 11 अक्टूबर 2026 को है और नवरात्रोत्सव 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर के बीच चलेगा। रविवार, 11 अक्टूबर को उत्सव की शुरुआत 'केसरी' रंग से होगी। केसरी रंग को ऊर्जा, चैतन्य और उत्साह का प्रतीक माना जाता है, इसलिए पहले ही दिन माहौल में अलग जोश दिखेगा।

सोमवार, 12 अक्टूबर को शांति और पवित्रता का प्रतीक 'सफेद' रंग पहना जाएगा। मंगलवार, 13 अक्टूबर को प्रेम और उत्साह का रंग 'लाल' उत्सव का मुख्य आकर्षण रहेगा। बुधवार, 14 अक्टूबर को 'नीला', गुरुवार, 15 अक्टूबर को चैतन्यमय 'पीला' और शुक्रवार, 16 अक्टूबर को प्रकृति से जोड़ने वाला 'हरा' रंग तय किया गया है।

उत्सव के आखिरी दौर में शनिवार, 17 अक्टूबर को 'ग्रे' यानी स्लेटी रंग, रविवार, 18 अक्टूबर को 'बैंगनी' रंग रहेगा। सोमवार, 19 अक्टूबर को 'मोरपंखी' रंग के साथ उत्सव का समापन होगा।

इन नौ दिनों में स्कूल, कॉलेज के युवक-युवतियों, अलग-अलग मंडलों और महिलाओं में इन रंगों का बड़ा क्रेज दिखेगा। दफ्तरों, सोसायटियों और सार्वजनिक जगहों पर भी इन रंगों के हिसाब से प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शो होंगे। इन आयोजनों से रंगों की बहार तो होगी ही, लोगों में आपसी मेलजोल और खुशियों का आदान-प्रदान भी बढ़ेगा।

पहला दिन, प्रतिपदा: शैलपुत्री और केसरी रंग। इस दिन माता शैलपुत्री की पूजा होती है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल शोभा देता है। नारंगी यानी भगवा रंग उत्साह, तेज, ऊर्जा और शौर्य का प्रतीक माना जाता है।

दूसरा दिन, द्वितीया: ब्रह्मचारिणी और सफेद रंग। कठोर तपस्या करने वाली इस देवी के हाथ में जपमाला और कमंडलु होता है। यह रूप ज्ञान, तप और संयम का प्रतीक है। सफेद रंग पवित्रता, शांति और स्वच्छता का प्रतीक माना जाता है।

तीसरा दिन, तृतीया: चंद्रघंटा और लाल रंग। माता के मस्तक पर घंटे के आकार का चंद्र सजा होता है, इसीलिए उन्हें चंद्रघंटा कहते हैं। यह रूप भक्तों के सारे संकटों का नाश करने वाला माना जाता है। लाल रंग ऊर्जा, साहस, पराक्रम और प्रेम का प्रतीक है।

चौथा दिन, चतुर्थी: कूष्मांडा और नीला रंग। सृष्टि की उत्पत्ति करने वाली माता कूष्मांडा का यह चौथा रूप है। अपनी मंद मुस्कान से पूरा ब्रह्मांड बनाने के कारण उन्हें आदिशक्ति माना जाता है। नीला रंग अथाह आकाश, स्थिरता और शांति का प्रतीक है।

पांचवां दिन, पंचमी: स्कंदमाता और पीला रंग। कार्तिकेय यानी स्कंद की माता स्कंदमाता यह पांचवां रूप हैं और कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। यह रूप माता और बालक के प्रेम का प्रतीक है। पीला रंग चैतन्य, आनंद, सकारात्मक ऊर्जा और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है।

छठा दिन, षष्ठी: कात्यायनी और हरा रंग। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर कन्या रूप में जन्म लिया, इसलिए उन्हें माता कात्यायनी कहते हैं। यह रूप बेहद तेजस्वी और योद्धा का माना जाता है। हरा रंग प्रकृति, समृद्धि, नई शुरुआत और वृद्धि का प्रतीक है।

सातवां दिन, सप्तमी: कालरात्रि और स्लेटी (ग्रे) रंग। माता पार्वती का सबसे उग्र रूप माता कालरात्रि हैं। उनका वर्ण काला और केश खुले होते हैं। यह रूप अंधकार और बुराई का नाश करने के लिए जाना जाता है। यह रंग संकटों का सामना करने की ताकत और मेहनती स्वभाव को दर्शाता है।

आठवां दिन, अष्टमी: महागौरी और बैंगनी रंग। बेहद गोरे वर्ण के कारण उन्हें महागौरी कहा जाता है। यह रूप अत्यंत शांत, संयमी और भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करने वाला माना जाता है। अष्टमी के दिन कन्यापूजा का खास महत्त्व होता है। बैंगनी रंग अध्यात्म, उच्च सोच, वैभव और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है।

नौवां दिन, नवमी: सिद्धिदात्री और मोरपंखी (पिकॉक ग्रीन) रंग। नवरात्र का आखिरी दिन माता सिद्धिदात्री को समर्पित है। वे हर तरह की सिद्धि और ज्ञान की प्राप्ति कराने वाली देवी हैं। यह रंग अद्वितीय सुंदरता, बुद्धिमत्ता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

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