पालघर: पेसा आरक्षण के खिलाफ कंत्राटी शिक्षकों का आमरण अनशन, दो महिलाओं की तबीयत बिगड़ी
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पालघर में पेसा आरक्षण के विरोध में 90 कंत्राटी शिक्षकों ने सोमवार (26 तारीख) से बेमुद्दत आमरण अनशन शुरू किया है। दो आंदोलनकारी महिलाओं की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।
पालघर में पेसा आरक्षण के विरोध में संविदा शिक्षकों ने सोमवार (26 तारीख) से बेमुद्दत आमरण अनशन शुरू कर दिया है। लोकप्रतिनिधियों और सरकार का ध्यान खींचने के लिए यह आंदोलन छेड़ा गया है। रात में आंदोलन कर रहे दो लोगों की तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
मामला 2014 से चला आ रहा है। उसी साल से पालघर समेत महाराष्ट्र के पेसा जिलों में आरक्षण का सवाल खड़ा हुआ है। इसमें ओबीसी, एससी, एनटी, वीजेएनटी, एसबीसी और बाकी सभी गैर आदिवासी समाज का क और ड श्रेणी के 17 संवर्गों की नौकरियों में संवैधानिक आरक्षण शून्य हो गया है। इस नाइंसाफी के खिलाफ पालघर जिले में अब तक कई आंदोलन हो चुके हैं और कुछ अब भी चल रहे हैं। फिर भी ओबीसी, एससी, एनटी, वीजेएनटी, एसबीसी और दूसरे गैर आदिवासी समाज को अभी तक न्याय नहीं मिला है।
महाराष्ट्र में इस वक्त शिक्षक भर्ती बड़े पैमाने पर चल रही है। पेसा जिला होने के नाते पालघर में भी यह भर्ती जारी है। पेसा जिलों में आरक्षण से प्रभावित 17 संवर्गों में शिक्षक का संवर्ग भी शामिल है, यानी इस पर भी असर पड़ा है।
आंदोलन करने वाले शिक्षक पालघर जिले के हैं और मानदेय के आधार पर संविदा पर काम करते हैं। वे नौकरी के लिए पात्र हैं, लेकिन पेसा आरक्षण की वजह से प्रभावित हुए हैं। ये सभी ओबीसी, एससी, एनटी, वीजेएनटी, एसबीसी और दूसरे गैर आदिवासी वर्गों से आते हैं। उनकी मांग है कि उन्हें नौकरी में स्थायी तौर पर शामिल किया जाए। इसी मांग को लेकर सांसद डॉ. हेमंत सवरा के निवास के सामने 21 अगस्त से आंदोलन चल रहा था।
सरकार के स्तर पर सिर्फ बातचीत और आश्वासन ही मिल रहे हैं, कोई ठोस फैसला नहीं हुआ। गैर आदिवासी मानदेय वाले स्थानीय संविदा शिक्षकों का कहना है कि धरना आंदोलन से भी उन्हें न्याय नहीं मिला। सांसद डॉ. हेमंत सवरा के निवास के सामने 66 दिन धरना देने के बाद भी जब कुछ हाथ नहीं आया, तो आंदोलनकारियों ने सोमवार (26 तारीख) से बेमुद्दत भूख हड़ताल यानी अनशन शुरू किया।
इस आंदोलन में कुल 90 संविदा शिक्षक शामिल हैं। इनमें से सुवर्णा साळुंखे और मनस्वी पाटील, इन दो आंदोलनकारियों की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें इलाज के लिए प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मनस्वी का इलाज होने के बाद वे फिर से अनशन की जगह पर लौट आईं। वहीं सुवर्णा का इलाज गंधे अस्पताल में अब भी चल रहा है।
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